’मातृ देवो भव पितृ देवो भव’

THE MOTHER
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अर्थात गर्भधारण करने वाली स्तनपान कराने वाली भोजन कराने वाली, गुरूपत्नि, विमाता, ईष्टदेवता की पत्नी, सौतेली बहन, सहोदर बहन, पुत्रबधु, सास, दादी, परनारी, भाई की स्त्री, मौसी, बुआ और नानी। माता के ये सभी रूप पूज्यनीय हैं। माता पिता को सर्वेश्रेष्ठ गुरू मानकर सच्चे हृदय से उनकी सेवा करने वाला ही संतान कहलाने योग्य है।

अर्थात गर्भधारण करने वाली स्तनपान कराने वाली भोजन कराने वाली, गुरूपत्नि, विमाता, ईष्टदेवता की पत्नी, सौतेली बहन, सहोदर बहन, पुत्रबधु, सास, दादी, परनारी, भाई की स्त्री, मौसी, बुआ और नानी। माता के ये सभी रूप पूज्यनीय हैं। माता पिता को सर्वेश्रेष्ठ गुरू मानकर सच्चे हृदय से उनकी सेवा करने वाला ही संतान कहलाने योग्य है।

ब्रहमावैवृत पुराण में सोलह स्त्रियों को माता की संज्ञा दी गयी है - स्तनदात्री, गर्भधात्री भक्ष्यदात्री गुरूप्रिया।  अभीष्ठदेवपत्नी च पूतःपत्नी च कन्यका।।  सगर्भजा या भगिनी पुत्र पत्नी प्रियापसूः।  मातुर्माता पितुमार्ता सोदरस्य प्रिया तथा।।  मातुः पितुश्च भगिनी मातुलानी तथैव च।  जनानां देवविहिता मातरः षोडश स्मृताः ।।

ब्रहमावैवृत पुराण में सोलह स्त्रियों को माता की संज्ञा दी गयी है - स्तनदात्री, गर्भधात्री भक्ष्यदात्री गुरूप्रिया। अभीष्ठदेवपत्नी च पूतःपत्नी च कन्यका।। सगर्भजा या भगिनी पुत्र पत्नी प्रियापसूः। मातुर्माता पितुमार्ता सोदरस्य प्रिया तथा।। मातुः पितुश्च भगिनी मातुलानी तथैव च। जनानां देवविहिता मातरः षोडश स्मृताः ।।

मातरं पितरं चोभौ दृष्ट्वा पुत्रस्तु धर्मवित्।  प्रणम्य मातरं पश्चात प्रणमेत् पितरं गुरूम्।।  मॉं के 21 नाम शास्त्रों में बतलाये गये हैं जिसकी पुष्टि करता हुआ यह स्त्रोत  माता, दया, शान्ती, क्षमा, धृति, स्वाहा, स्वधा, गौरी, पदमा, विजया, जया तथा दुःखहन्त्री नाम से माता की स्तुति करता है।  व्यास जी कहते है। कि जिस प्रकार मॉं भगवती के दर्शन से उत्पन्न आनन्द को वाणी द्वारा व्यक्त नहीं किया जा सकता उसी प्रकार माता पिता का दर्शनमात्र  बालक की पीड़ा का शमन कर देता है।

मातरं पितरं चोभौ दृष्ट्वा पुत्रस्तु धर्मवित्। प्रणम्य मातरं पश्चात प्रणमेत् पितरं गुरूम्।। मॉं के 21 नाम शास्त्रों में बतलाये गये हैं जिसकी पुष्टि करता हुआ यह स्त्रोत माता, दया, शान्ती, क्षमा, धृति, स्वाहा, स्वधा, गौरी, पदमा, विजया, जया तथा दुःखहन्त्री नाम से माता की स्तुति करता है। व्यास जी कहते है। कि जिस प्रकार मॉं भगवती के दर्शन से उत्पन्न आनन्द को वाणी द्वारा व्यक्त नहीं किया जा सकता उसी प्रकार माता पिता का दर्शनमात्र बालक की पीड़ा का शमन कर देता है।

’’पितुरप्यधिका माता गर्भधारणपोषणातं ।  अतो हि त्रिषु लोकेषु नास्ति मृतसमोगुरूः।।’’ अर्थात पुत्र के लिए माता का स्थान पिता से भी बढ़कर है  क्योंकि वह उसे गर्भ में धारण कर उसका पालन पोषण करती है।  अतः तीनों लोकों में माता के समान दूसरा गुरू नहीं है।  व्यास मुनि स्पष्ट कहते हे। कि धर्मज्ञ पुत्र माता पिता को एक साथ देंखे, तो पहले माता को प्रणाम करें फिर पिता रूपी गुरू को प्रणाम करें।

’’पितुरप्यधिका माता गर्भधारणपोषणातं । अतो हि त्रिषु लोकेषु नास्ति मृतसमोगुरूः।।’’ अर्थात पुत्र के लिए माता का स्थान पिता से भी बढ़कर है क्योंकि वह उसे गर्भ में धारण कर उसका पालन पोषण करती है। अतः तीनों लोकों में माता के समान दूसरा गुरू नहीं है। व्यास मुनि स्पष्ट कहते हे। कि धर्मज्ञ पुत्र माता पिता को एक साथ देंखे, तो पहले माता को प्रणाम करें फिर पिता रूपी गुरू को प्रणाम करें।

तो जाने प्रभु प्रसन्न हैं बस यही मालिक के प्रसन्न होने या अप्रसन्न होने के जानने की विधि है।  भारतीय संस्कृति में माता पिता का स्थान सर्वोपरि माना गया है-  मॉ बाप ऐसे भावपूर्ण शब्द है जो श्रवण मात्र से तन मन में ऊर्जा का संचार कर देते हैं।  माता पिता बंदनीय है पूज्यनीय है।  महान ऋषि पराशर पुत्र महर्षि व्यास ने महर्षि जाबालि को इस गूढ सूत्र का ज्ञान देते हुये कहा कि माता पिता से बढ़कर इस त्रिभुवन  में अन्य कोई पूज्यनीय नहीं है स्त्रोत का प्रथम श्लोक ही माता की महिमा का गान प्रस्तुत करता है-

तो जाने प्रभु प्रसन्न हैं बस यही मालिक के प्रसन्न होने या अप्रसन्न होने के जानने की विधि है। भारतीय संस्कृति में माता पिता का स्थान सर्वोपरि माना गया है- मॉ बाप ऐसे भावपूर्ण शब्द है जो श्रवण मात्र से तन मन में ऊर्जा का संचार कर देते हैं। माता पिता बंदनीय है पूज्यनीय है। महान ऋषि पराशर पुत्र महर्षि व्यास ने महर्षि जाबालि को इस गूढ सूत्र का ज्ञान देते हुये कहा कि माता पिता से बढ़कर इस त्रिभुवन में अन्य कोई पूज्यनीय नहीं है स्त्रोत का प्रथम श्लोक ही माता की महिमा का गान प्रस्तुत करता है-

सम्पूर्ण ब्रहृम्ड में जलचर, थलचर नभचर नाना में कोई ऐसा जीव नहीं मिलेगा जो ये नहीं चाहता कि प्रभु प्रसन्न रहे परन्तु वह यह भी जानना चाहता है  कि परमात्मा हमसे प्रसन्न है कि नहीं। इस रहस्यमयी जानकारी का पता कैसे चले,यह भी सभी जानने को उत्सुक रहते हैं।  प्रायः सुख,दुख लाभ हानि जीवन मरण के माध्यम से ही मालिक के अनुकूल और प्रतिकूल होने का अंदाज लगाते हैं।  भारत वर्ष के महान ऋषियों ने इस रहस्य को भी प्राणीमात्र को बताया कि अपने माता पिता का श्रीमुख देखो यदि वे प्रसन्नचित हैं

सम्पूर्ण ब्रहृम्ड में जलचर, थलचर नभचर नाना में कोई ऐसा जीव नहीं मिलेगा जो ये नहीं चाहता कि प्रभु प्रसन्न रहे परन्तु वह यह भी जानना चाहता है कि परमात्मा हमसे प्रसन्न है कि नहीं। इस रहस्यमयी जानकारी का पता कैसे चले,यह भी सभी जानने को उत्सुक रहते हैं। प्रायः सुख,दुख लाभ हानि जीवन मरण के माध्यम से ही मालिक के अनुकूल और प्रतिकूल होने का अंदाज लगाते हैं। भारत वर्ष के महान ऋषियों ने इस रहस्य को भी प्राणीमात्र को बताया कि अपने माता पिता का श्रीमुख देखो यदि वे प्रसन्नचित हैं

आपको पता नही चल पाता और आप (माता पिता) का आर्शीवाद लेकर दिन का आरम्भ करने वाले पहाड़ को राई करते चले जाते हैं आपका जीवन औरों के लिये प्रेरणादायी बन जाता है।

आपको पता नही चल पाता और आप (माता पिता) का आर्शीवाद लेकर दिन का आरम्भ करने वाले पहाड़ को राई करते चले जाते हैं आपका जीवन औरों के लिये प्रेरणादायी बन जाता है।

परमात्मा मनुष्य शरीर धारण कर हम मनुष्यों जैसा ही रहन-सहन पठन पाठक करते हैं  और पाप और पुण्य का अन्तर समझाते व बताते हुये लीला करते र्हैं। इस लीला के माध्यम से उनका स्पष्ट संकेत है कि दिन उसी का निकलता है  जो नित्य अपने माता-पिता,गुरू, बुजुर्गो के श्रीचरणें में मस्तक नवाते हैं बदले में उनका अकाटय आर्शीवाद, ढेरसारा प्यार प्राप्त करते है  फिर आप उसके सहारे सदा उजीयाले यानि प्रकाश में ही जीवन जीते हैं।

परमात्मा मनुष्य शरीर धारण कर हम मनुष्यों जैसा ही रहन-सहन पठन पाठक करते हैं और पाप और पुण्य का अन्तर समझाते व बताते हुये लीला करते र्हैं। इस लीला के माध्यम से उनका स्पष्ट संकेत है कि दिन उसी का निकलता है जो नित्य अपने माता-पिता,गुरू, बुजुर्गो के श्रीचरणें में मस्तक नवाते हैं बदले में उनका अकाटय आर्शीवाद, ढेरसारा प्यार प्राप्त करते है फिर आप उसके सहारे सदा उजीयाले यानि प्रकाश में ही जीवन जीते हैं।

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