** IN HINDU HOW MANY GOD (33 COORS GOD ???+33 करोड़ देवी देवता????? OR 33 GOD???

the god** IN HINDU HOW MANY GOD ???
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वही सनातन धकितने लोग हैं जिन्होंने वेद पढ़े? सभी ने पुराणों की कथाएं जरूर सुनी और उन पर ही विश्वास किया तथा उन्हीं के आधार पर अपना जीवन जिया और कर्मकांड किए।   पुराण, रामायण और महाभारत धर्मग्रंथ नहीं इतिहास ग्रंथ हैं।  ऋषियों द्वारा पवित्र ग्रंथों, चार वेद एवं अन्य वैदिक साहित्य की दिव्यता एवं अचूकता पर जो श्रद्धा रखता है  वही सनातन धर्म की सुदृढ़ नींव को बनाए रखता है conti.......

वही सनातन धकितने लोग हैं जिन्होंने वेद पढ़े? सभी ने पुराणों की कथाएं जरूर सुनी और उन पर ही विश्वास किया तथा उन्हीं के आधार पर अपना जीवन जिया और कर्मकांड किए। पुराण, रामायण और महाभारत धर्मग्रंथ नहीं इतिहास ग्रंथ हैं। ऋषियों द्वारा पवित्र ग्रंथों, चार वेद एवं अन्य वैदिक साहित्य की दिव्यता एवं अचूकता पर जो श्रद्धा रखता है वही सनातन धर्म की सुदृढ़ नींव को बनाए रखता है conti.......

(1. वंदना, 2. वेदपाठ, 3. व्रत, 4. तीर्थ, और 5. दान) लेकिन इसके अलावा कुddछ और जान ने लायक बातें भी हैं.../ कितने लोग हैं जिन्होंने वेद पढ़े? सभी ने पुराणों की कथाएं जरूर सुनी और उन पर ही विश्वास किया तथा उन्हीं के आधार पर अपना जीवन जिया और कर्मकांड किए।  पुराण, रामायण और महाभारत धर्मग्रंथ नहीं इतिहास ग्रंथ हैं।  ऋषियों द्वारा पवित्र ग्रंथों, चार वेद एवं अन्य वैदिक साहित्य की दिव्यता एवं अचूकता पर जो श्रद्धा रखता हैconti.......

(1. वंदना, 2. वेदपाठ, 3. व्रत, 4. तीर्थ, और 5. दान) लेकिन इसके अलावा कुddछ और जान ने लायक बातें भी हैं.../ कितने लोग हैं जिन्होंने वेद पढ़े? सभी ने पुराणों की कथाएं जरूर सुनी और उन पर ही विश्वास किया तथा उन्हीं के आधार पर अपना जीवन जिया और कर्मकांड किए। पुराण, रामायण और महाभारत धर्मग्रंथ नहीं इतिहास ग्रंथ हैं। ऋषियों द्वारा पवित्र ग्रंथों, चार वेद एवं अन्य वैदिक साहित्य की दिव्यता एवं अचूकता पर जो श्रद्धा रखता हैconti.......

वेदानुस- ार यज्ञ पांच प्रकार के होते हैं-1.ब्रह्म- यज्ञ, 2.देवयज्ञ, 3.पितृयज्ञ, 4.वैश्वदेव यज्ञ और 5.अतिथि यज्ञ । उक्त पांच यज्ञों को पुराणों और अन्य ग्रंथों में विस्तार दिया गया है।   वेदज्ञ सार कहा जाता है कि वेदों को अध्ययन करना और उसकी बातों की किसी जिज्ञासु के समक्ष चर्चा करना पुण्य का कार्य है , लेकिन किसी बहसकर्ता या भ्रमित व्यक्ति के समक्ष वेद वचनों को कहना निषेध माना जाता है।conti.......

वेदानुस- ार यज्ञ पांच प्रकार के होते हैं-1.ब्रह्म- यज्ञ, 2.देवयज्ञ, 3.पितृयज्ञ, 4.वैश्वदेव यज्ञ और 5.अतिथि यज्ञ । उक्त पांच यज्ञों को पुराणों और अन्य ग्रंथों में विस्तार दिया गया है। वेदज्ञ सार कहा जाता है कि वेदों को अध्ययन करना और उसकी बातों की किसी जिज्ञासु के समक्ष चर्चा करना पुण्य का कार्य है , लेकिन किसी बहसकर्ता या भ्रमित व्यक्ति के समक्ष वेद वचनों को कहना निषेध माना जाता है।conti.......

यम नियम का पालन करना प्रत्येक सनातनी का कर्तव्य है।  यम अर्थात 1.अहिंसा, 2.सत्य, 3.अस्तेय, 4.ब्रह्मचर्- और 5.अपरिग्रह।  नियम अर्थात 1.शौच, 2.संतोष, 3.तप, 4.स्वाध्याय और 5.ईश्वर प्राणिधसंध- ि काल में ही संध्या वंदन की जाती है । वैसे संधि पांच या आठ वक्त (समय) की मानी गई है, लेकिन सूर्य उदय और अस्त अर्थात दो वक्त की संधि महत्वपूर्ण- है।  इस समय मंदिर या एकांत में गायत्री से ईश्वर की प्रार्थना की जाती है।conti.

यम नियम का पालन करना प्रत्येक सनातनी का कर्तव्य है। यम अर्थात 1.अहिंसा, 2.सत्य, 3.अस्तेय, 4.ब्रह्मचर्- और 5.अपरिग्रह। नियम अर्थात 1.शौच, 2.संतोष, 3.तप, 4.स्वाध्याय और 5.ईश्वर प्राणिधसंध- ि काल में ही संध्या वंदन की जाती है । वैसे संधि पांच या आठ वक्त (समय) की मानी गई है, लेकिन सूर्य उदय और अस्त अर्थात दो वक्त की संधि महत्वपूर्ण- है। इस समय मंदिर या एकांत में गायत्री से ईश्वर की प्रार्थना की जाती है।conti.

'आनो भद्रा कृत्वा यान्तु विश्वतः'- ऋग्वेद के इस मंत्र का अर्थ  है कि किसी भी सदविचार को अपनी तरफ किसी भी दिशा से आने दें।  ये विचार सनातन धर्म एवं धर्मनिष्ठ साधक के सच्चे व्यवहार को दर्शाते हैं।  चाहे वे विचार किसी भी व्यक्ति, समाज, धर्म या सम्प्रदाय से हो। यही सर्वधर्म समभाव: है। conti.......

'आनो भद्रा कृत्वा यान्तु विश्वतः'- ऋग्वेद के इस मंत्र का अर्थ है कि किसी भी सदविचार को अपनी तरफ किसी भी दिशा से आने दें। ये विचार सनातन धर्म एवं धर्मनिष्ठ साधक के सच्चे व्यवहार को दर्शाते हैं। चाहे वे विचार किसी भी व्यक्ति, समाज, धर्म या सम्प्रदाय से हो। यही सर्वधर्म समभाव: है। conti.......

आत्मा के मोक्ष प्राप्त करने से ही यह चक्र समाप्त होता है।वेद प्राकृतिक तत्वों की प्रार्थना किए जाने के रहस्य को बताते हैं।  ये नदी, पहाड़, समुद्र, बादल, अग्नि, जल, वायु, आकाश और हरे-भरे प्यारे वृक्ष हमारी कामनाओं की पूर्ति करने वाले हैं । इनकी पूजा नहीं प्रार्थना की जाती है।  यह ईश्वर और हमारे बीच सेतु का कार्य करते हैं। conti.......

आत्मा के मोक्ष प्राप्त करने से ही यह चक्र समाप्त होता है।वेद प्राकृतिक तत्वों की प्रार्थना किए जाने के रहस्य को बताते हैं। ये नदी, पहाड़, समुद्र, बादल, अग्नि, जल, वायु, आकाश और हरे-भरे प्यारे वृक्ष हमारी कामनाओं की पूर्ति करने वाले हैं । इनकी पूजा नहीं प्रार्थना की जाती है। यह ईश्वर और हमारे बीच सेतु का कार्य करते हैं। conti.......

कर्म से ही भाग्य का निर्माण होता है। कर्म एवं कार्य-कारण के सिद्धांत अनुसार प्रत्येक व्यक्ति अपने भविष्य के लिए पूर्ण रूप से स्वयं ही उत्तरदायी है।  प्रत्येक व्यक्ति अपने मन, वचन एवं कर्म की क्रिया से अपनी नियति स्वयं तय करता है।  इसी से प्रारब्ध बनता है। कर्म का विवेचन वेद और गीता में दिया गया है।कर है।सनातन हिन्दू धर्म पुनर्जन्म में विश्वास रखता है । जन्म एवं मृत्यु के निरंतर पुनरावर्तन- की प्रक्रिया से गुजरती हुई आत्मा अपने पुराने शरीर को छोड़कर नया शरीर धारण करती है।conti.......

कर्म से ही भाग्य का निर्माण होता है। कर्म एवं कार्य-कारण के सिद्धांत अनुसार प्रत्येक व्यक्ति अपने भविष्य के लिए पूर्ण रूप से स्वयं ही उत्तरदायी है। प्रत्येक व्यक्ति अपने मन, वचन एवं कर्म की क्रिया से अपनी नियति स्वयं तय करता है। इसी से प्रारब्ध बनता है। कर्म का विवेचन वेद और गीता में दिया गया है।कर है।सनातन हिन्दू धर्म पुनर्जन्म में विश्वास रखता है । जन्म एवं मृत्यु के निरंतर पुनरावर्तन- की प्रक्रिया से गुजरती हुई आत्मा अपने पुराने शरीर को छोड़कर नया शरीर धारण करती है।conti.......

।र्म की सुदृढ़ नींव को बनाए रखता है।उपनिषद एक ही परमतत्व को मानते हैं।सनातन हिन्दू धर्म की मान्यता  है कि सृष्टि उत्पत्ति, पालन एवं प्रलय की अनंत प्रक्रिया पर चलती है। गीता में कहा गया है  कि जब ब्रह्मा का दिन उदय होता है, तब सब कुछ अदृश्य से दृश्यमान हो जाता है  और जैसे ही रात होने लगती है, सब कुछ वापस आकर अदृश्य में लीन हो जाता है।  वह सृष्टि पंच कोष तथा आठ तत्वों से मिलकर बनी है।  परमेश्वर सबसे बढ़सनातन हिन्दू धर्म भाग्य से ज्यादा कर्म पर विश्वास रखता है। conti.......

।र्म की सुदृढ़ नींव को बनाए रखता है।उपनिषद एक ही परमतत्व को मानते हैं।सनातन हिन्दू धर्म की मान्यता है कि सृष्टि उत्पत्ति, पालन एवं प्रलय की अनंत प्रक्रिया पर चलती है। गीता में कहा गया है कि जब ब्रह्मा का दिन उदय होता है, तब सब कुछ अदृश्य से दृश्यमान हो जाता है और जैसे ही रात होने लगती है, सब कुछ वापस आकर अदृश्य में लीन हो जाता है। वह सृष्टि पंच कोष तथा आठ तत्वों से मिलकर बनी है। परमेश्वर सबसे बढ़सनातन हिन्दू धर्म भाग्य से ज्यादा कर्म पर विश्वास रखता है। conti.......

को पकड़ते हैं विस्तार को नहीं।मोक्ष- की धारणा और इसे प्राप्त करने का पूरा विज्ञान विकसित किया गया है।   यह सनातन धर्म की महत्वपूर्ण- देन में से एक है। मोक्ष में रुचि न भी हो तो भी मोक्ष ज्ञान प्राप्त करना अर्थात इस धारणा के बारे में जानना प्रमुख कर्तव्य है। पितरों के लिए श्रद्धा से किए गए मुक्ति कर्म को श्राद्ध कहते हैं  तथा तृप्त करने की क्रिया और देवताओं, ऋषियों या पितरों को तंडुल या तिल मिश्रित जल अर्पित करने की क्रिया को तर्पण कहते हैं।conti.......

को पकड़ते हैं विस्तार को नहीं।मोक्ष- की धारणा और इसे प्राप्त करने का पूरा विज्ञान विकसित किया गया है। यह सनातन धर्म की महत्वपूर्ण- देन में से एक है। मोक्ष में रुचि न भी हो तो भी मोक्ष ज्ञान प्राप्त करना अर्थात इस धारणा के बारे में जानना प्रमुख कर्तव्य है। पितरों के लिए श्रद्धा से किए गए मुक्ति कर्म को श्राद्ध कहते हैं तथा तृप्त करने की क्रिया और देवताओं, ऋषियों या पितरों को तंडुल या तिल मिश्रित जल अर्पित करने की क्रिया को तर्पण कहते हैं।conti.......

तर्पण करना ही पिंडदान करना है। श्राद्ध पक्ष का सनातन हिंदू धर्म में बहुत ही महत्व माना गया है। दान से इंद्रिय भोगों के प्रति आसक्ति छूटती है।  मन की ग्रथियां खुलती है जिससे मृत्युकाल में लाभ मिलता है।  मृत्यु आए इससे पूर्व सारी गांठे खोलना जरूरी है।  दान सबसे सरल और उत्तम उपाय है। वेद और पुराणों में दान के महत्व का वर्णन किया गया है ....

तर्पण करना ही पिंडदान करना है। श्राद्ध पक्ष का सनातन हिंदू धर्म में बहुत ही महत्व माना गया है। दान से इंद्रिय भोगों के प्रति आसक्ति छूटती है। मन की ग्रथियां खुलती है जिससे मृत्युकाल में लाभ मिलता है। मृत्यु आए इससे पूर्व सारी गांठे खोलना जरूरी है। दान सबसे सरल और उत्तम उपाय है। वेद और पुराणों में दान के महत्व का वर्णन किया गया है ....

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