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गरूर ए शान से उठता है,

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शहादत ज़ाया नहीं जाएगी वतन पर मिटने वालो की , सहीदों ने लहू से ख़ाक की फसलों को सींचा है । कफ़न में चैन से सोती नहीं रूहें , वतन की हिफाज़त

गरूर ए शान से उठता है सर जब उसके आगे , गोया नाखुदा से बढ़के भी कोई आदम ए हौआ हुआ है । कुदरत की सब नैमतें हैं जिसकी, दिन शाम ओ सेहर

गरूर ए शान से उठता है सर जब उसके आगे , गोया नाखुदा से बढ़के भी कोई आदम ए हौआ हुआ है । कुदरत की सब नैमतें हैं जिसकी, दिन शाम ओ सेहर

गरूर ए शान से उठता है सर जब उसके आगे , गोया नाखुदा से बढ़के भी कोई आदम ए हौआ हुआ है । कुदरत की सब नैमतें हैं जिसकी, दिन शाम ओ सेहर