जश्न ए ज़ीनत की आरज़ू ,

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जश्न ए ज़ीनत की आरज़ू तमाम उम्र , लब से उफ़ तक न किया अनकही कहे बगैर । तबाही खुद मचाई बुत बने बैठा किये थे साख पर , अब इल्तेज़ा ए हुश्न

जश्न ए ज़ीनत की आरज़ू तमाम उम्र , लब से उफ़ तक न किया अनकही कहे बगैर । तबाही खुद मचाई बुत बने बैठा किये थे साख पर , अब इल्तेज़ा ए हुश्न

जश्न ए ज़ीनत की आरज़ू तमाम उम्र , लब से उफ़ तक न किया अनकही कहे बगैर । तबाही खुद मचाई बुत बने बैठा किये थे साख पर , अब इल्तेज़ा ए हुश्न

जश्न ए ज़ीनत की आरज़ू तमाम उम्र , लब से उफ़ तक न किया अनकही कहे बगैर । तबाही खुद मचाई बुत बने बैठा किये थे साख पर , अब इल्तेज़ा ए हुश्न

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