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दो वक़्त की रोटी,

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दो वक़्त की रोटी और आँखों में शर्म बना के रख , ज़र ज़ोरू और ज़मीन के ख़ातिर क्या ज़मीर बेंच खायेगा । ये हसीं वाकिया होकर के गुज़र गया ,

दो वक़्त की रोटी और आँखों में शर्म बना के रख , ज़र ज़ोरू और ज़मीन के ख़ातिर क्या ज़मीर बेंच खायेगा । ये हसीं वाकिया होकर के गुज़र गया ,

दो वक़्त की रोटी और आँखों में शर्म बना के रख , ज़र ज़ोरू और ज़मीन के ख़ातिर क्या ज़मीर बेंच खायेगा । ये हसीं वाकिया होकर के गुज़र गया ,

दो वक़्त की रोटी कभी दो वक़्त के लाले , गरीब की तक़दीर में क्या बोसा ए मोहब्बत क्या आरज़ू ए निवाले । इस तरह ज़मीर से रूह ओ जान में बसा है

दो वक़्त की रोटी कभी दो वक़्त के लाले , गरीब की तक़दीर में क्या बोसा ए मोहब्बत क्या आरज़ू ए निवाले । इस तरह ज़मीर से रूह ओ जान में बसा है

दो वक़्त की रोटी कभी दो वक़्त के लाले , गरीब की तक़दीर में क्या बोसा ए मोहब्बत क्या आरज़ू ए निवाले । इस तरह ज़मीर से रूह ओ जान में बसा है