नज़र ए फ़ानी,

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नज़र ए फ़ानी से क़त्ल करते हैं , गुलपोश ए गुल बेख़्याली वाले । कहते हैं मैक़दे में इबादत नहीं होती , बिना जाम छलकाए भी तो मोहब्बत नहीं होती ।

नज़र ए फ़ानी से क़त्ल करते हैं , गुलपोश ए गुल बेख़्याली वाले । कहते हैं मैक़दे में इबादत नहीं होती , बिना जाम छलकाए भी तो मोहब्बत नहीं होती ।

नज़र ए फ़ानी से क़त्ल करते हैं , गुलपोश ए गुल बेख़्याली वाले । कहते हैं मैक़दे में इबादत नहीं होती , बिना जाम छलकाए भी तो मोहब्बत नहीं होती ।

नज़र ए फ़ानी से क़त्ल करते हैं , गुलपोश ए गुल बेख़्याली वाले । कहते हैं मैक़दे में इबादत नहीं होती , बिना जाम छलकाए भी तो मोहब्बत नहीं होती ।

नज़र ए फ़ानी से क़त्ल करते हैं , गुलपोश ए गुल बेख़्याली वाले । कहते हैं मैक़दे में इबादत नहीं होती , बिना जाम छलकाए भी तो मोहब्बत नहीं होती ।

नज़र ए फ़ानी से क़त्ल करते हैं , गुलपोश ए गुल बेख़्याली वाले । कहते हैं मैक़दे में इबादत नहीं होती , बिना जाम छलकाए भी तो मोहब्बत नहीं होती ।

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