Factful Debate

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हिन्दू धर्म के धर्मी लोगों के साथ बड़ी बहस | TRAILER | Watch Sadhna TV on 5th May 2024 at 7:30PM | By Spiritual Leader Saint Rampal JiFacebook
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अनिरुद्धाचार्य का झूठ पकड़ा | #factfulshorts #fakebaba #aniruddhacharyaji #shorts #reels | Spiritual Leader Saint Rampal Ji | Spiritual Leader Saint Rampal Ji · Original audio
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हिन्दू धर्म के धर्मी लोगों के साथ बड़ी बहस | TRAILER | Watch Sadhna TV on 5th May 2024 at 7:30PM | हिन्दू धर्म के धर्मी लोगों के साथ बड़ी बहस | TRAILER | Watch Sadhna TV on 5th May 2024 at 7:30PM | By Spiritual Leader Saint Rampal JiFacebook
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Episode : 14 | आमना सामना बड़ी बहस | 28-04-2024 | Sant Rampal Ji Maharaj Live Satsang | Episode : 14 | आमना सामना बड़ी बहस | 28-04-2024 | Sant Rampal Ji Maharaj Live Satsang | By Spiritual Leader Saint Rampal Ji | हम संत रामपाल जी को गुरु क्यों बनाया है? वो शास्त्रों के अकॉर्डिंग ज्ञान बताते हैं. तो ये कौन सा न्यारा चीज बता रहे हैं बताइए? कंपेयर करोगे ना तो आपको पता चलेगा. बकवास खाते हैं. पढ़ने वाले बच्चे को पढ़ना चाहिए. ये वीडियो शूट होती है. क्लास में टीचर को पीट देते हैं, थप्पड़ मार देते हैं. अब वो किस वजह से हो रहा है? क्योंकि उन्हें सद्भुति मार्ग नहीं मिल रहा. संत रामपाल जी महाराज भी कोई मुर्दे को जीवित कर सकते हैं क्या जी? हाँ जी बिल्कुल. और ये सच्चाई है. और जब संत रामपाल जी महाराज की जेल में हैं. तो इस पूरे तामझाम का क्या मतलब रह जाता है? श्री राम का देख लीजिए चौदह वर्ष तक ये किसी की चोरी करके नहीं गए murder करके नहीं गए ये आजादी चाहते थे। आज होगा आमना सामना। बिना समय गवाए इस वीडियो की शुरुआत करते हैं। पहला सवाल मैं करता हूँ संत रामपाल जी महाराज के श्रद्धालुओं से। मेरा नाम जसविंदर सिंह जी मैं सिरसा से हूँ हम संत रामपाल जी को गुण क्यों बनाएं? क्योंकि हमने संत भी हैं उनको गुरु बना लेंगे। सवाल नंबर एक दुनियाओं में लाखों धर्मगुरु हैं। संत रामपाल जी महाराज को गुरु क्यों बनाए? आइए देखते हैं आध्यात्मिक बहस। संत रामपाल जी महाराज को गुरु क्यों बनाए जी? गुरु में क्या होती है कि बहुत सारी qualities होती है। आपको ये वो गुरु जो सभी को equally treat करे जो सभी को equally ज्ञान दे और एक ही परमात्मा की definition बताए वो ही पूर्ण संत होता है। संत रामपाल जी महाराज जी जो है वो शास्त्रों के according ज्ञान बताते हैं। अभी आपने पहले भी संत देखे होंगे और भी गुरु देखे होंगे। लेकिन किसी ने भी शास्त्र खोल के हमें नहीं दिखाया। और दूसरी बात रही बात गीता जी के अध्याय नंबर पंद्रह के श्लोक एक से चार में संसार रूपी उल्टा लटका हुआ वृक्ष है। और उसमें बताया कि जो पूर्ण गुरु होगा वो उस संसार रूपी उलटे लटके वृक्ष की हर एक चीज हर एक उसकी टहनी क्या है? उसकी शाखा क्या है? उसकी जड़ क्या है? वो सारी चीजें वो बिलकुल clean करेगा, हर एक चीज को वेदों से प्रमाणित करेगा। दर्शकों आध्यात्मिक बहस में सवाल उठा कि संत रामपाल जी महाराज को गुरु क्यों बनाए? ये सवाल बेहद महत्वपूर्ण है, श्रद्धालुओं को समझ नहीं आ रहा आखिर कैसे इन लाखों धर्म गुरुओं की भीड़ में उस परम संत को पहचाने जो ना सिर्फ उन्हें सही ज्ञान दे बल्कि उनके जीवन में जो दुख है उनका समाधान भी करें। तो आइए आज आपको इस उलझन से बाहर निकालते हैं। दर्शकों अब कुछ बातों पर गौर कीजिए। यदि आप शास्त्रों पर जैसे की गीता, वेद, कुरान, बाइबल आदि पर पूरा विश्वास रखते हैं। तो निसंदेह आज आपकी तलाश पूरी हो जाएगी। आज आप ये जान पाएंगे कि लाखों धर्म गुरुओं की भीड़ में कौन है? पूर्ण संत वही अगर आप पवित्र वेदों पर विश्वास करते हैं तो उठाइए पवित्र सांवेद, जिसकी संख्या नंबर आठ सौ बाईस पर साफ-साफ लिखा है कि वो पूर्ण संत तीन बार में अपने भक्तों को नाम दीक्षा देता है। इसके साथ ही यजुर्वेद अध्याय उन्नीस। मंत्र पच्चीस व छब्बीस में लिखा है कि वह पूर्ण के अधूरे वाक्यों अर्थात सांकेतिक शब्दों वे एक चौथाई श्लोकों को पूरा करके विस्तार से बताएगा वो तीन समय की पूजा बताएगा सुबह पूर्ण परमात्मा की पूजा दोपहर को विश्व के देवताओं का सत्कार और संध्या यानी सूरज ढलने के बाद की आरती संत रामपाल जी महाराज एकमात्र ऐसे संत हैं जिन्होंने वेदों के आधे-अधूरे अनुवादों को सही-सही बताया है जिन्होंने गीता व अन्य सभी ग्रंथों का गूढ़ रहस्य जो आज तक अनसुलझी पहेली बने हुए थे उनको भी सरलता से सुलझाया है संत रामपाल ही वो संत हैं जो अपने भक्तों को तीन समय पूजा करने का प्रावधान बताते हैं वो अपने शिष्यों को सुबह का नित्य नियम दोपहर की रमेणी और संध्या की आरती करने को कहते हैं। संत गरीब दास जी महाराज ने सूक्ष्म वेद की वाणियों में भी कहा है सतगुरु के लक्षण कहूँ मधुरे बैन विनोद चार वेद शट शास्त्र कहे अठारह बोल संत गरीब दास जी अपनी वाणी में पूर्ण संत की पहचान बता रहे हैं कि वह पूर्ण संत चारों वेदों, शहर शास्त्रों, अठारह पुराणों, आदि सभी ग्रंथों का पूर्ण जानकार होगा। अर्थात उनका निकाल कर बताएगा। संत रामपाल जी महाराज एकमात्र संत हैं जिन्होंने सभी सद ग्रंथों को टीवी पर खोल-खोल कर दिखाया है. संत रामपाल जी महाराज प्रथम बार में श्री गणेश जी, श्री ब्रह्मा सावित्री जी, श्री लक्ष्मी विष्णु जी, श्री शंकर पार्वती जी, व माता श्रीराम वाली का नाम जाप देते हैं. जिनका वास हमारे मानव शरीर में बने चक्रों में होता है. मूलाधार चक्र में, श्री गणेश जी का वास, स्वाद चक्र में ब्रह्मा, सावित्री जी का वास, नाभि चक्र में लक्ष्मी विष्णु जी का वास, ह्रदय चक्र में, शंकर पार्वती जी का वा कंठ चक्र में श्री राम वाली माता का वास है और इन सब देवी-देवताओं के आदि-अनादि नाम मंत्र होते हैं. जिनका वर्तमान में गुरुओं को ज्ञान नहीं है. इन मंत्रों के जाप से ये पाँचों चक्र खुल जाते हैं. इन चक्रों के खुलने के बाद मानव भक्ति करने के लायक बनता है. संत गरीब दास जी अपनी वाणी में प्रमाण देते हैं कि पाँच नाम गूंज गायत्री आत्मतत्व जगाओ. ओम क्लियम हरियम श्री अम सोहम. संत गरीब दास जी बता रहे हैं कि पाँच नाम जो गूज गायत्री है. इनका जाप करके आत्मा को जागृत करो. फिर दूसरी बार में दो का जाप दिया जाता है जिनमें एक और दूसरा तत्व जो कि गुप्त है संत Rampal जी सिर्फ अपने उपदेशी शिष्य को बताते है जिनका श्वास के साथ जाप किया जाता है फिर तीसरी बार में सारनाम देते है जो कि पूर्ण रूप से गुप्त है दर्शकों आध्यात्मिक ज्ञान चर्चा में सवाल पूछा गया कि संत रामपाल जी महाराज से ही नाम दीक्षा क्यों ले तो आइए एक बार संत रामपाल जी महाराज के आध्यात्मिक प्रवचनों से भी जान लेते है कि तत्वदर्शी संत की क्या पहचान है श्रीमद भगवत गीता अध्याय नंबर पंद्रह के श्लोक नंबर एक से चार में निष्कर्ष है. कि उल्टे लटके हुए संसार रूपी वृक्ष के सभी विभागों को जो बता देगा. सहवेद वित्त वो तत्वदर्शी संत है वो वेद के तात्पर्य को जानने वाला. तो परमेश्वर कबीर जी ने छह सौ वर्ष पहले अपनी सचिदानंद, की वाणी में, सुख संवेद में बताया. अक्षर पुरुष एक पेड़ है. निरंजन बाकी डार तीनों ये देखिएगा ये एक संसार रूपी उल्टा लटका हुआ वृक्ष जानो जिसके ऊपर को जड़ है और नीचे को तीनों गुण रूपी शाखा है रक्गुण ब्रह्मा, सतगुण विष्णु, तगुण शिव जी ये संसार रूपी वृक्ष समझो अब जो जमीन से बाहर दिखाई देता है उसको वृक्ष बोलते है अब यहाँ परमात्मा कबीर जी ने कहा था अक्षर पुरुष एक पेड़ है. ये अक्षर पुरुष इसको अक्षर पुरुष कहो, परब्रह्म कहो, अक्षर भ्रम कहो तो तना तो समझो अक्सर ब्रह्म अक्षर पुरुष है और सरपुरुष या सर्वप्रहम कहो ये सर्वप्रहम कहो या सरपुरुष सर्वपुरुष कहो ये काल है ज्योति निरंजन है ब्रह्म है गीता ज्ञान दाता है और इसके तीन पुत्र है तीन शाखाएं है रजगुण ब्रह्मा, सद्गुण, विष्णु, तवगुण शिव जी और ये गुप्त है जो परमात्मा, ये परम अक्षर ब्रह्म है, ये परम अक्षर ब्रह्म है जिससे सबका धारण-पोषण होता है। ये परम अक्षर धर्म है। इसको पूर्ण ब्रह्म परमेश्वर भी कहते हैं। ये मूल है पूरे संसार रूपी वृक्ष की. तो अक्षर पुरुष एक पेड़ है परमेश्वर कबीर जी ने बताया था अक्षर पुरुष एक पेड़ है की डार. और तीनों देवा. शाखा हैं पात रूप संसार. आहा. अब ये पूरा एक संसार रूपी वृक्ष है और गीता अध्याय नंबर पंद्रह के, श्लोक नंबर एक में कहा है कि जो इन उल्टा लटके संसार रूपी वृक्ष के सभी पत्तों से लेकर, जड़ से लेकर पत्तों तक बता देगा वो तत्वदर्शी संत है, ये पहचान बता दीजिए। भगवत गीता अध्याय नंबर पंद्रह के श्लोक नंबर एक से चार का निष्कर्ष है. के जब तत्वदर्शी संत मिल जावे और वो ऐसे बताएगा, ये उसकी पहचान है. उसके पश्चात परमेश्वर के उस पद की खोज करनी चाहिए, जहाँ जाने के बाद फिर लौटकर कभी संसार में साधक नहीं आते, उनका पूर्ण मोक्ष हो जाता है। और जिस परमेश्वर ने सारे ब्रह्मांडों की रचना की है, अर्थात संसार रूपी वृक्ष की प्रवृत्ति जिससे विस्तार को प्राप्त हुई है, उसी की पूजा करनी चाहिए गीता ज्ञान दाता दृढ़ता से कहता है। अपने विषय में गीता ज्ञान दाता अध्याय नंबर चार के श्लोक नंबर पाँच और नौ में गीता के अध्याय नंबर दो के श्लोक नंबर बारह में गीता जी अध्याय नंबर दस के श्लोक नंबर दो में खुद कहता है कि अर्जुन तेरे और मेरे बहुत जन्म हो चुके हैं तू नहीं जानता मैं जानता हूँ और ये ना समझ कि ये सभी सैनिक पहले नहीं थे, तू नहीं था या मैं नहीं था अर्थात हम तू मैं और ये सब पहले भी जन्मे थे, आगे भी जन्मते रहेंगे। इससे सिद्ध है कि गीता ज्ञान दाता स्वयं ही नाशवान है। सर्व पुरुष है। तो इसके साधक भी नाशवान हैं। तो ये इसलिए कह रहा है कि तू सर्वे भाव से उस परमेश्वर की शरण में जा गीता के ध्यान में अठारह के श्लोक नंबर बासठ में। कि जिसकी कृपा से तू परम शांति को और सनातन परमधाम को स्थानम उस कभी नाश होने वाले उस स्थान सतलोक को अविनाशी लोक को प्राप्त हो जाएगा। दर्शक जैसा कि आपने देखा कि संत रामपाल जी महाराज ने गीता जी के अध्याय पंद्रह के श्लोक एक से चार में वर्णित संसार रूपी पीपल के वृक्ष को विस्तार से समझाया। जिसको केवल एक तत्वदर्शी संत ही समझा सकता है। साथ ही गीता जी के उन गूढ़ श्लोकों का भावार्थ भी समझाया। जिन श्लोकों में पूर्ण परमात्मा के बारे में बताया गया है। फिर से एक प्रमाण इन्होंने बताया सर कि संत रामपाल जी महाराज का ज्ञान औरों से अलग है क्योंकि वो शास्त्र खोल के क्या और सुन शास्त्र खोल के नहीं दिखाते? मैं श्री भगवान चरखी दादरी से आया हूँ मेरा एक ही कहना है गीता जी की ये दुनिया भर के श्लोक बताते हैं. गीता जी में तो एक का चीज लिखी है. जैसा कर्म करेगा वैसा फल देगा भगवान. हाँ. तो ये कौन सा न्यारा चीज बता रहे हैं बताइए. मेरा नाम कमलजीत है. मैं हिसार से हूँ. श्री भगवान जी ने कहा कि जो जैसा करेगा वैसा काटेगा. जी. लेकिन हम पवित्र सनातनी धर्म को मानने वाले लोग हैं. जी जी. अगर हम उस धर्म से बिलोंग करते हैं तो हमें ये भी पता होगा. यहाँ पे ये तभी हमें अच्छे कर्म करने चाहिए. कंपेयर करोगे ना तो आपको पता चलेगा कि अच्छे कर्म हम करें कैसे? वो बताने वाला भी तो चाहिए ना कर्म हमें कैसे करने चाहिए. और वो कर्म कैसे करने हैं? वो भक्ति विधि कैसे अपनाने हैं? वो हमें संत रामपाल जी महाराज ने खोल के बताई. अब सवाल निकल कर सामने आया कि गीता में कर्म को महत्व दिया गया है. व्यक्ति को कर्म करना चाहिए. फल की चिंता नहीं करनी चाहिए. तो आइए अब ये भी समझ लेते हैं कि कर्म कौन से करने चाहिए? और कैसे करने चाहिए? सोचिए. एक आदमी के पास दो खेत हैं। उनमें से एक खेत को वो रोज जोतता है उसकी देखभाल भी करता है। उसने उसकी मिट्टी इतनी उपजाऊ बना ली है कि बीज डालते ही पौधा उग जाएगा। अब वहीं दूसरी ओर वह दूसरे खेत की देखभाल नहीं करता। उसकी तरफ ध्यान नहीं देता। उसमें उगे खरपतवार को भी नहीं हटाता। अगर वह आदमी उपजाऊ बने खेत में बीज ना डाले तो क्या उस खेत की मिट्टी को उपजाऊ बनाने का कोई फायदा हुआ? वह खेत बिल्कुल वैसा ही जैसा दूसरा खेत है जिसमें खरपतवार उगे है। बिलकुल ऐसा ही हमें मनुष्य जीवन को मानना पड़ेगा। प्रत्येक मनुष्य का धर्म है कि आप अच्छे कर्म करो, किसी का बुरा ना करो। लेकिन सिर्फ इतना ही करने से परमात्मा प्राप्ति नहीं होगी। उसके लिए आपको इस मनुष्य रूपी खेत में सद्भक्ति रूपी बीज तो डालना ही पड़ेगा। ताकि आपको इस मनुष्य रूपी खेत से पूर्ण लाभ मिल सके। अब रही बात कि कौन से कर्म करने योग्य है? और कौन से कर्म करने योग्य नहीं है? यही Arjuna के दिमाग में भी उठा इस सवाल पर Gita ज्ञान दाता ने Gita अध्याय सोलह श्लोक चौबीस में कहा है कि इससे तेरे लिए Arjuna कर्तव्य और अकर्तव्य की व्यवस्था में शास्त्र ही प्रमाण है इसे जानकर शास्त्र विधि से नियत कर्म ही करने योग्य है अर्थात शास्त्रोंक्त साधना ही फलदायी होती है और उसी का पालन करना चाहिए धर्मग्रंथों के बाहर किसी भी प्रकार की धार्मिक प्रथा या अनुष्ठान मनमाना आचरण है कहने का भावार्थ यही है कि कर्म तो करने ही चाहिए लेकिन कौन से कर्म करने चाहिए और कौन से नहीं करने चाहिए ये भी आपको तत्वदर्शी संत ही बता सकता है जिसको सब शास्त्रों का पूर्ण ज्ञान हो वर्तमान में वो तत्वदर्शी संत जैसा कि आपको प्रमाणित कर चुके हैं केवल और केवल संत रामपाल जी महाराज ही है कि आप लोग मानव जीवन का उद्देश्य क्या समझते हो हाँ sir नमस्कार sir मेरा नाम अनिल है मैं राजस्थान से हूँ जी सर मैं simple इतना जानता हूँ कि मनुष्य जीवन एक बार मिलता है और ये लाइफ enjoy करने के लिए जीने के लिए है जिओ खूब जिओ और खूब जी भर के जियो और आज के टाइम में टाइम में पैसे की बहुत वैल्यू है. जिसके पास पैसा है वो सब कुछ है. भगवान कहीं नहीं है. ये सिर्फ एक मिथ्या है. अगर है तो मैं देखना चाहूँगा वो कैसा है. दर्शकों पूरे विश्व में हिंदुस्तान एक ऐसा देश है जो भगवान पर सबसे ज्यादा आस्था रखता है. लेकिन अजीब बात है कि जब बात भगवान के अस्तित्व पर आती है तो लोग बोलते हैं भगवान किसने देखा है? भगवान तो निराकार है. वो दिखाई नहीं देता. लोग बहुत सारी ऐसी बातें भी कहते हैं जो आस्तिक व्यक्ति को भी नास्तिक की लाइन में खड़ा कर देती है. इस बहस अब दो सवाल ये निकल कर सामने आए कि किसने देखा भगवान? मतलब भगवान कौन है? कैसा है? कहाँ रहता है? और दूसरा सवाल ये कि पैसा ही सब कुछ है क्या वास्तव में पैसा ही सब कुछ है? आइए सबसे पहले शुरू करते है इस सवाल के साथ कि क्या पैसा ही सब कुछ है? दर्शकों कोरोना महामारी के दौरान लाखों ऐसे लोग थे जिनके पास करोड़ों की संपत्ति थी लेकिन भगवान की बनाई oxygen की कमी के चलते मृत्यु हो गई. करोड़ों ऐसे लोग थे जिनके पास पैसे की कोई कमी नहीं थी लेकिन cancer से तड़प कर मर गए हजारों ऐसे लोग थे जिनके पास अरबों की संपत्ति थी लेकिन accident में काल का ग्रास बन गए क्या पैसे ने व्यक्ति के श्वास बढ़ा दिए क्या उनका पैसा उन्हें कोई लाभ दे पाया दर्शकों ऐसे कई उदाहरण है जिनके पास अथाह संपत्ति थी लेकिन मौत से जब सामना हुआ तो कुछ भी काम नहीं आयी ये है जानी मानी company Apple के founder Steve Jobs अगर की संपत्ति की बात करें तो इनके पास लगभग आठ खरब तैंतीस अरब रुपए की संपत्ति थी महज छप्पन वर्ष की आयु में पेट में कैंसर होने से इनकी मौत हो गई। चंद श्वास तक ठीक से नहीं खरीद पाए। पैसा सब कुछ है या नहीं आप खुद विचार कीजिए। भगवान की संपत्ति के सामने इंसान की संपत्ति का क्या मूल्य है? ऐसे ना जाने कितने ही धनाढ्य लोग इस संसार में हैं। लेकिन हजारों ऐसे मोड़ आते हैं जब आपको एहसास होता है कि जीवन में पैसा महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण है ये मानव शरीर जिसका सबसे मुख्य उद्देश्य है पूर्ण संत से नाम दीक्षा लेकर अपने जीवन का कल्याण करवाना क्योंकि इस संसार में जीवन हर पल किसी ना किसी ऐसी अनहोनी का शिकार हो रहा है जिसकी वो कभी कल्पना भी नहीं कर सकता अब सवाल ये उठता है कि ये सब कैसे टल सकता है क्योंकि भगवान तो आज तक किसी ने देखा नहीं है यहाँ तक कि आज तक किसी ने स्पष्टता से उसका नाम तक नहीं बताया है आज आपके इन सभी सवालों के जवाब दिए जाएँगे video को अंत तक ज़रूर देखिएगा दर्शकों कहते है कि इस सृष्टि को बनाने वाला का पालनहार सबका सृजनहार केवल एक परमात्मा है ये तो हर कोई जानता है कि कुल का मालिक एक है लेकिन वो है कौन उसका क्या नाम है यहाँ आकर प्रत्येक धर्म के श्रद्धालुओं का मत अलग अलग हो जाता है ये महज़ Hindu धर्म की बात नहीं है हर धर्म के श्रद्धालु अलग अलग देवी देवताओं महापुरुषों देवीय शक्तियों को किसी ना किसी रूप में मान रहे है लेकिन पूर्ण परमात्मा का जब नाम आता है तो सब एक जाते हैं कि भगवान एक ही है। अगर बात हिंदू धर्म की करें तो कोई कृष्ण को भगवान मानता है तो कोई विष्णु को तो कोई माता दुर्गा को ऐसे ही मुस्लिम ईसाई और सिख धर्म के श्रद्धालु भगवान को निराकार मानते हुए अपने-अपने मतानुसार किसी ना किसी महापुरुष को अपना इष्ट मानकर साधना कर रहे हैं। इन सबके बीच बहुत बड़ी तादाद में ऐसे श्रद्धालु भी हैं जो Kabir को भगवान मानते हैं। अब आप सोच रहे होंगे कि Kabir भगवान कैसे हो सकता है? जी हाँ जो Kabir आज तक एक कवी के तौर पर एक संत के रूप में एक दास व भक्त रूप में माने जाते थे उनको एकाएक भगवान कैसे समझा जाने लगा ये सिर्फ प्रचार का नतीजा है या फिर विचार का विषय कहते है मनुष्य जाती को सबसे श्रेष्ठ इसलिए कहा गया है क्योंकि मनुष्य विचार करने की क्षमता रखता है तो फिर चलिए आज इस पहलू पर विचार करते है कि कौन है कबीर वो परमात्मा नर आकार है मनुष्य दृश्य है वो सह शरीर है उसका नाम कबीर है और सतलोक में रहता है, वहाँ भी मनुष्य दृश्य है। राजा के समान मुकुट धारण करता है वो परमात्मा। अभी सभी पवित्र धर्मों के पवित्र सद्ग्रंथों से प्रमाणित किया जाएगा। ये देखिएगा यजुर्वेद। प्रकाशक है सर्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा. दो बटा पाँच महर्षि दानंद भवन रामलीला मैदान नई दिल्ली से. ये यहाँ से छपा है मुद्र के prince upset printers पंद्रह सौ दस पटौदी house दरियागंज नई दिल्ली से इस पांचवे अध्याय का बत्तीस मसलों का आपको दिखाते हैं। ये है पंचमोध्याय पाँचवा और ये यजुर्वेद ये बत्तीस बाँध है, श्लोक है, मंत्र है. यहाँ लिख रखा है, उसी गशी कबीर रंगधारी. अब हम इसको कबीर बोलते हैं ब बैर ये है हम वे बोला करे जैसे किसी का नाम वेद प्रकाश होता है अब कहाँ गया? आवेद प्रकाश आ जा. जैसे कोई धर्मवीर है तो धर्मवीर बोल्या कर राम. ये हमारा अपना लोकल लैंग्वेज है. तो हम इसको कबीर को कबीर बोलते हैं. अंगारी माने पापों का शत्रु, बम भारी माने, बंधनों का शत्रु. इन्हीं का स्वर ज्योति, ऋत धामा सी. ये देखो. हे जगदीश्वर, जिस कारण आप कांतिमान है. अंगारी माने छोटे चलन के जीवो छोटे चरण वाले जीवों के शत्रु नहीं. ये तो बकवाद कर रखी है इन्होंने ठीक नहीं किया. अंरी माने शत्रु. अरी इसको संधि क्षेत्र अंग, अरी, अग, अग माने अंग माने पाप होता है. पाप का शत्रु. और इसने क्या कर दिया इसका अर्थ कर दिया। संधि छेद करते समय इसको ऐसे कर दिया। और हम इसको अगर जैसे ये यजुर्वेद है यही इसका इन्हीं से सेट होगा ये मामला। अब ये छत्तीसवा अध्याय यजुर्वेद का दयानंद वाला अनुवाद है इसका। इसके प्रथम मंत्र में लिखा है रेचम वाचम, परपदे मनो, यजू परपदे, ये यजू शब्द है ना ओमड़ी और यहाँ अनुवाद इसने इसका इसमें यजू का अर्थ, यजुर्वेद लिख दिया, बिल्कुल सही किया। अब ये यजू है, यहाँ लिखना पड़ेगा कि ये यजुर्वेद के विषय में है, ये पूरा अब बना इसका अर्थ। यजुर्वेद। तो यहाँ ये देखो कवि है, इन्होंने यहाँ कभी कर दिया इस पाँचवें अध्याय का और ये जो बत्तीसवाँ श्लोक हम पढ़ रहे हैं। इसमें ये जो कबीर शब्द है, इसको इस इन्होंने ऐसे करत लिख दिया। अब इसका अर्थ करते समय यह लिखना चाहिए था। कबीर देव लिख देते हैं। ये कबीर वे कबीर लिख देते कबीर देव लिख देते। तो हम उसको कबीर देव बोल रहे हैं, कबीर देव। हम उसको कबीर देव देव माने परमेश्वर कबीर साहब हैं यहाँ लिखना चाहिए वो कबीर देव हैं ये ये कहना कवी इनकी वो समस्या भी हल हो जाए कभी वो कबीर देव लिखना था कबीर देव हैं हम उसको कबीर साहब बोलते हैं कबीर अपने लोकल language में वो कबीर साहब हैं बम भारी माने बंधनों के अरि माने शत्रु ये तारा दिए जिसकी बकवास है तेरा आरी माने सतरुग बंधनों के शत्रु बस ये ये छोड़ दो यानी बंधन के माने शत्रु बम माने बंधन. बंधनों के शत्रु बंधी छोड़ हैं कौन? वो कबीर हैं, कबीर देव हैं. और अंगारी माने पाप नाशक ये गलत किया इसने. और फिर कौन है वो? रत धामा सी. रत धामा, सतधामयुक्त, सतलोक युक्त, हम सतधाम के उन सतनाम. सतलोक कह देते हैं लोक कहो, धाम कहो एक ही बात है. सतलोक, युक्त. यानी रत धामा यानी वो सतलोक वाले हैं, सतलोक में रहते हैं। हैं और सबर ज्योति स्वयं प्रकाशित, सबर ज्योति कर रखा है इनमें अंतरिक्ष को प्रकाश करने वाले। समर ज्योतिष का अर्थ है स्वयं प्रकाशित तेजों में शरीर युक्त परमात्मा है। ये है ऋग्वेद मंडल नंबर नौ सूक्त बयासी का ऋग्वेद मंडल नंबर नौ और सुख व्यासी और यहाँ देखें ये है बयासी मास, इक्यासी वां समाप्त हुआ, ये बयासीवा शुरू हो जाता है। इसका प्रथम मंत्र इसमें लिखा है कि जो सर्वोत्पादक प्रभु सबकी उत्पत्ति करने वाला परमेश्वर प्रकाश रूप है इसका अर्थ है वो तेजों में स्वरूप साकार है सद्गुणों की वृष्टि करने वाला पापों का हरण करने वाला पाप नाश करने वाला पाप क्षमा करने वाला है वह राजेव राजा के समान अह राजेव इसका अर्थ है राजा के समान आगे लिखा है ये देखना ये दो सौ उनहत्तर पृष्ठ पर पढ़ रहे हैं हम कोई ब्रह्म देगा एक दूसरा पृष्ठ दिखा दिया होगा। ये दो सौ सत्तर दिखाऊंगा। ये देखो दो सौ सत्तर। यहाँ लिखा है बयासी का पहला का नौ के बयासी का राजा के समान दर्शनीय है वो देखण जोगा है visible है वो साकार है राजा की तरह तो मनुष्य जैसा ही हुआ और वो है पृथ्वी आदि लोक लोकांतरों के चारों और सबदे मान हो रहा है वह वर्णीय पुरुष को वर्णीय माने अच्छी आत्मा को श्रेष्ठ पुरुष को जो दृढ़ भक्त है जो दृढ़ भक्त है उसको पवित्र करता हुआ। प्राप्त होता है। देखिएगा। ऋग्वेद मंडल नंबर नौ सूक्त बयासी का अब दो पढ़ते हैं। वो परमात्मा किस उद्देश्य से आता है? हे परमात्मा, उपदेश करने की इच्छा से आप। महापुरुषों को प्राप्त होते हो। अच्छी आत्माओं को, महान आत्माओं को प्राप्त होते हो। और आप अत्यंत गतिशील पदार्थ के समान हमारे आध्यात्मिक यज्ञों को प्राप्त होते हो। यानी अत्यंत गतिशील पदार्थ के समान यानी जैसे बीजड़ी चलती है, बिजली जैसी गति से आप और उपदेश करने के लिए आते हो यहाँ पर सच्चा ज्ञान देने के लिए। आप कबीर देव हैं, अह आप कबीर देव यह लिखना था, सर्वज्ञ लिख दिया, आप यहाँ लिखना था, आप कबीर देव हैं। हम उसको कबीर साहब कहते हैं। आप क़बीर साहब है, शुद्ध स्वरूप है। अब जैसे ये अभी आपको दिखाया था, जहाँ यजू लिखा हो तो यजुर्वेद लिखना पड़ेगा वहाँ पर। वो इन्होंने किया भी है, महर्षि दयानंद ने यजुर्वेद के छत्तीसवें अध्याय के प्रथम अंतर में यजू का अर्थ, यजुर्वेद किया है, तो यहाँ लिखना था, वो कबीर देव है। वो शुद्ध स्वरूप है। हमारे पापों को हे दूर करके, हे सोम, हे अमर परमात्मा हमको सुख दे। अब यहाँ है, ऋग्वेद मंडल नंबर नौ सुक्त चम्बन के और मंत्र नंबर तीन में किया है कि सूर्य के समान जगत प्रेरक वह परमात्मा, यह परमात्मा इसका सीधा सार ले लेते हैं, लोकों को पवित्र करता हुआ। भुनो प्री, भुअनो, उपरी, संपूर्ण ब्रह्मांडो, भवन माने लोकों के ऊपर ऊर्ध्व भाग में, ऊपर भाग में वर्तमान विराजमान है। वहां बैठा है। ऋग्वेद मंडल नंबर नौ, सूक्त नंबर छियासी में। और छब्बीस मंत्र ये क्या बताता है? यज्ञ करने वाले यजमानों के लिए परमात्मा यज्ञ माने धार्मिक अनुष्ठान शास्त्र अनुकूल करने वाले यजमान माने भक्तों के लिए परमात्मा सब रास्तों को ओहो सुगम करता हुआ। उनके विघ्नों का मर्जन करता है उनके संकटों का नाश कर देता है। और उनको पवित्र करता हुआ। अपने रूप को यानी साकार है ना भगवान इनके शब्दों में अपने रूप को सरल करता हुआ वह कांति में परमात्मा सर्वज्ञ लिखा है कभी हम इसको कबीर देव वो कबीर देव विद्युत के समान यानि बिजली की तरह क्रीड़ा करता हुआ वर्णीय पुरुषों को श्रेष्ठ आत्माओं को अच्छी आत्माओं को प्राप्त होता है मिलता है कहाँ रहता है वो सत्ताईस लिखा है घणा नहीं यहीं से अपने जो परमात्मा धुलोक के ये प्रकाशकुंज परमात्मा इन तेज-तेज, तेज पुंज का भगवान है वो तेज पुंज का हो, चाहे प्रकाश पुंज का हो जो परमात्मा जू लोक के तीसरे पृष्ठ पर विराजमान है जो वहाँ रहता है तीसरे पृष्ठ पर और वहाँ से चलकर आकर मिलता है. प्रकाश रूप है आहा पुण्य आत्माओं वेद पढ़े पर भेद ना जाने ये प्राण अठारह वेद पढ़े पर भेद ना जाने। गुरु बिन का उन पाया ज्ञाना जो थो था किसाना गुरु बिन वेद पढ़े जो प्राणी समझे ना सार रहे अज्ञानी। ये अज्ञानी रहे इन वेदों को पढ़ा करते और महर्षि को आ गए। इन कका भी नहीं पता था। अब जैसे वो परमात्मा मनुष्य दृश्य ये सिद्ध हो गया राजा के समान देखने जोगा है। और वहां से गति करके आता है दिन महापुरुषों को मिलता है। दिन महापुरुषों ने मिला उनने बताया कबीर is god. वो देव काशी में हम सुल्तानी नानक तारे दादू को उपदेश दिया। कबीर होया। आदरणीय गरीब दास साहिब जी गाँव छुड़ाने जिला झज्जर वाले जिनको भगवान आकर मिले थे। क्या कहते हैं गरीब दास साहिब ने फिर बताया है कि झूठा भूल गए मर जाने नू और सर्व कला सतगुरु साहेब की, हरियाये हरियाणे नू वो परमात्मा हरियाणा में आए, गरीब दास जी दो सौ अस्सी वर्ष पहले लगभग सन सत्रह सौ सत्ताईस में लगभग तीन सौ वर्ष हो गए। तीन सौ वर्ष से भी ऊपर हो गए। सन सत्रह सौ सत्ताईस में परमात्मा आए थे। और सन उन्नीस सौ छियासठ में हरियाणा और पंजाब अलग हुए। जब हरियाणा क्षेत्र का नाम पढ़ा था यो हरियाणा प्रांत बना था। उससे भी कितने वर्ष पहले दो सौ, ढाई सौ वर्ष पहले परमात्मा ने लिख दिया, बोल दिया था गरीब दास साहिब जी ने कहा था कि हरी आए हरयाणे नू उनके वचन से फिर यूँ हरियाणा क्षेत्र आज बनके रहा ताकि हम इस परमात्मा की वाणी को समझा सके। अगर ये दो सौ वर्ष पहले बोलते, सौ वर्ष, पचास वर्ष पहले से बोलते थे कहाँ आए थे हरियाणा था ही नहीं जब नामोनिशान नहीं था। तो यो हरियाणा बनवा दिया रीबिया, वाणी हमारे इसको याद दिला दी कि हरी आए, हरयाणे नू दर्शकों संत रामपाल जी महाराज ने वेदों से ये तो प्रमाणित कर दिया कि वह परमात्मा कबीर है। और वह सह शरीर है। आइए अब आपको प्रमाण दिखाते हैं वह परमात्मा। किस-किस को मिले? जिनको परमात्मा आकर मिले वह अपना साक्षात्कार कराकर अपनी समर्थता से परिचित करवाया। गवाह नंबर एक। धनी धर्मदास बांधवगढ़ मध्यप्रदेश। धनी धर्मदास वो महान आत्मा है जिनको परमात्मा कबीर स्वयं आकर मिले और उनसे पवित्र कबीर सागर लिपिबद्ध करवाया। धर्मदास जी को तत्व ज्ञान समझ आया और वो व्याकुल हो उठे। इसके बाद धर्मदास जी के बहुत विनय करने पर परमात्मा कबीर जी ने उन्हें अपना निष्ठाम सतलोक दिखाया। व अपनी संपूर्ण जानकारी दी गवाह नंबर दो नानक देव जी सिख धर्म के प्रवर Guru Nanak देव जी का जन्म संचोदह सौ उनहत्तर वर्तमान Pakistan के Punjab प्रांत तलवंडी भाई नामक जगह पर एक Hindu परिवार में हुआ एक दिन परमात्मा कबीर जी नानक देव जी को नदी पर मिले और उन्हें वास्तविक ज्ञान समझाया उनको सतलोक दिखाकर अपना गवाह बनाया गवाह नंबर तीन दादू दयाल जी अहमदाबाद गुजरात संत दादू दयाल जी का जन्म गुजरात प्रांत के अहमदाबाद में विक्रमी संवत सो एक यानि सन पंद्रह सौ चवालीस को एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। जिन्हें परमात्मा कबीर जी एक बूढ़े बाबा के रूप में सन पंद्रह सौ इक्यावन में मिले थे। और उन्हें अपना गवाह बनाया। दादू दास जी को अपने साथ सतलोक ले गए। और अपनी समर्थता से परिचित करवाया। गवाह नंबर चार। गरीब दास जी महाराज। गरीब दास जी महाराज का जन्म सन सत्रह सौ सत्रह। वर्तमान हरियाणा प्रदेश के जिला झज्जर के गाँव छुड़ाने में हुआ। परमात्मा कबीर बालक गरीब दास जी को नाम उपदेश दिया वो उनकी आत्मा को शरीर से निकालकर अपने साथ सतलोक ले गए। गवाह नंबर पाँच मलूकदास जी इलाहाबाद उत्तरप्रदेश। संत मलूक दास जी का जन्म कड़ा जिला इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश के कक्कड़ खत्री, अरोड़ा परिवार में हुआ था। आदरणीय मलूक दास जी को बयालीस वर्ष की आयु में परमात्मा कबीर जी मिले थे। गवाह नंबर चार संत घी सदा जी महाराज बागपत उत्तरप्रदेश। घीसा दास जी का जन्म उत्तर प्रदेश के जिला मेरठ, वर्तमान जिला बागपत, गाँव खेकड़ा में विक्रमी संवत, अठारह सौ साठ यानी सन अठारह सौ तीन में हुआ था। परमात्मा कबीर जी ने घीसा दास जी को मंत्र उपदेश दिया। तथा उनकी आत्मा को शरीर से निकालकर अपने साथ सतलोक ले गए। गवाह नंबर सात। सन बारह सौ चौवालीस में परमात्मा कबीर जी समस्त्रवेश के रूप में रूमी को मिले थे। परमात्मा कबी की अपनी पुण्य आत्माओं को मिलने की ये सूची बहुत लंबी है Namdev Ramdev पीर हजरत मोहम्मद मीरा बाई जैसी बहुत सारी पुण्यात्माओं को भी परमात्मा कबीर जी मिले व सत्य ज्ञान समझाया वास्तविक भक्ति विधि बताई आइए अब आगे बढ़ते हैं और देखते हैं कि इस आध्यात्मिक बहस में और क्या सवाल निकलकर सामने आते हैं? संत रामपाल जी महाराज के श्रद्धालु तो देखिए परमाणु का जखीरा लेकर बैठे हुए हैं हर एक शास्त्र से गीता हो गए तो पता नहीं लोग क्रिटिसाइज क्यों करते हैं? खैर आज की इस डिबेट में सब क्लियर हो ही जाएगा. तो आप देख रहे हैं कि इनके पास ऐसे वेद मंत्र, गीता के मंत्र रटे हुए हैं. फिलहाल यहाँ पर मैं देख पा रहा हूँ कि युवा पीढ़ी की तादाद बहुत ज्यादा है. उधर से भी सवार आ रहा है. मैं जरूर आऊंगा सर आपके पास. एक और सवाल है जो आम समाज के मन में उमड़ता रहता है. कि इन बच्चों की अभी पढ़ने-लिखने की उम्र है. अरे अपना करियर बनाने की उम्र है. ये अपना करियर छोड़कर पढ़ाई-लिखाई छोड़कर यहाँ आश्रम में क्या कर रहे हैं? जी बताइए. पहली बात तो सर हम पढ़ाई छोड़ नहीं रहे. आपने काम पढ़ाई छोड़कर पढ़ाई नहीं छोड़ी है मैं खुद अपनी पढ़ाई कर रही हूँ competitive exams की तैयारी करते हैं और जो ये सद्भक्ति है ये किसी प्रकार से हमें पढ़ाई से दूर नहीं करती हमारे career को बनाने में कोई बाधा नहीं देती इसमें ऐसी कोई भक्ति नहीं है कि हमें सुबह, दोपहर, शाम को दो-दो घंटे बैठ के कोई हड्डियों करने आए भई मंत्र पढ़ने आँख बंद करके ऐसे बैठ जाएंगे। ऐसी कोई भक्ति नहीं है। ये सद्भक्ति है। इस सद्भक्ति से हमारे career पे कोई effect नहीं होता। प्लस ये है कि जो हमारी बुरी आदत है। उनसे इन सद्भक्ति की वजह से इनके ज्ञान की वजह से दूर है. आज हम देखते हैं युवा युवा वर्ग है. उसमें नशे का इतना ज्यादा होता जा रहा है कि लोग नशा कर रहे हैं. अपने स्टैण्डर्ड को मेंटेन करने का, अपने आप को कूल शो करने के लिए वो नशा कर रहे हैं. और भी बहुत सी बुरी आदतों में फंस रहे हैं. ड्रग्स आज हमारे हिंदुस्तान में भी इतने ज्यादा ड्रग्स लोग लेने लगे हैं. युवा वर्ग स्पेशली वो बहुत ज्यादा ड्रग्स में फंस चुके हैं. वो चीजें हैं जो हमारी क्लूर बनाती हैं. ना कि ये सदभक्ति है. ये तो हमें बुरे आदतों से बचाती है. और हमें एक अच्छाई का मार्ग देती है. आज देश में क्या हो रहा है? धर्म के नाम पर धर्म के ठेकेदारों ने धंधे खोद रखे हैं. और कुछ नहीं है बकवास खाते हैं। पढ़ने वाले बच्चे को पढ़ना चाहिए। भर्ती करने के लिए तो दिल में आस्था होनी चाहिए। point है boss. एकदम सही बात निकल करके आई। हाँ जी इसका कोई जवाब। जी बताइए। aspirants की बात की UPSC aspirants के main focus के आगे भी बच्चों को तो पढ़ना चाहिए तो क्या आपको आपका ये मानना है कि बच्चों को पढ़ने के लिए छोड़ देना चाहिए उन्हें ना तो कोई सामाजिक जानकारी देनी चाहिए ना उन्हें हमारी जो holy books है उनका ज्ञान भी नहीं करवाना चाहिए हमारी सनातन भक्ति तभी से चली आ रही है और आज हमारे गुरुकुल व्यवस्था भी आपने देखी होगी उस समय के जो बच्चे थे उनको देखेंगे और आज की युवा पीढ़ी को देखेंगे तो कितना अंतर पाएँगे उस समय में कितनी respect अपने गुरु के लिए होती थी अपने के लिए होती थी और आज के युवा वर्ग को देखिए। उनके अंदर अगर सद्भक्ति की थोड़ी बहुत भी भावनाएं होती है अगर ज्ञान उन्हें होता सद्भक्ति का तो वो अपने से बड़ों की respect करते आज भी हम युवा वर्ग देखते है कि video shoot होती है class में teacher को पीट देते है थप्पड़ मार देते है ऐसा युवा वर्ग आज तैयार हो रहा है वो किस वजह से हो रहा है क्योंकि उन्हें सद्भक्ति मार्ग नहीं मिल रहा। मान लिया आपने ये तो social चीजें है ये तो moral चीजें है लेकिन कोई बताने वाला भी होना चाहिए और बताने वाला भी होते है और माँ बाप भी बताते है बच्चों को लेकिन वो इतना अच्छे से guide हो पाते क्योंकि उनका जो mentally strength है ना वो सद्भक्ति से ध्यान से हमारे ग्रंथों से वो एक अलग दिशा लेती है। शिक्षा ये एक ऐसा शब्द है जो आम से खास बना देता है लेकिन अगर शिक्षा शब्द को हम केवल भौतिक शिक्षा तक ही सीमित रखें तो सही नहीं होगा भौतिक शिक्षा के जरिए अगर आप आध्यात्मिक शिक्षा प्राप्त करते है तो सही मायने में आप शिक्षित है वरना भौतिक शिक्षा से केवल आप चतुरता और अहंकार युक्त होकर अपने जीवन को विनाश की तरफ ही लेकर जाएंगे। दरअसल शिक्षा मानव जीवन पर एक उपकार है ताकि हम अपने सदग्रंथों को समझ सकें। हमसे वो भूल ना हो जो हमारे पूर्वजों से हुई। जिनको इन तथाकथित विद्वान कहे जाने वाले धर्म गुरुओं, कथावाचकों ने मूर्ख बना रखा था। क्योंकि इन तथाकथित धर्म गुरुओं ने भी केवल शिक्षा ग्रहण की। आध्यात्मिकता नहीं जिससे ये चतुर हो गए वही गलती आज नहीं दोहरानी चाहिए। हमें केवल शिक्षा नहीं करनी बल्कि शिक्षा के जरिए आध्यात्मिकता ग्रहण करनी है ताकि हम अपने शास्त्रों को पढ़कर मानव जीवन के मूल उद्देश्य को समझकर मनुष्य जीवन का कल्याण करवा सके केवल शिक्षा को महत्व देने से नुकसान ये हुआ कि आज भी ये तथाकथित धर्मगुरु Sanskrit शब्द वृज का मतलब आना बता रहे हैं क्योंकि वो जानते हैं कि आज का युवा केवल शिक्षा ग्रहण कर रहा है उसका लाभ नहीं उठा रहा है वरना आप तुरंत शब्दकोश निकालकर उनके सामने रखते और बताते कि आप गलत बता रहे हैं लेकिन जी महाराज के अनुयायी शिक्षित होने का सही लाभ उठा रहे हैं। इसीलिए सवाल पूछ रहे हैं कि यदि देवी भागवत पुराण में ब्रह्मा, विष्णु, महेश नाशवान है तो आज तक पूर्ण परमात्मा बताकर उनको अविनाशी बताकर हमसे गलत साधना क्यों करवाई गई? कबीर को जुलाहा बताकर, कबीर बताकर उनकी वास्तविक जानकारी क्यों छिपाई गई? आज संत रामपाल जी महाराज ने शिक्षा का सही इस्तेमाल करके समाज को ये समझाया कि अगर कबीर साहिब इतने साधारण जुलाह या कवि थे तो सह शरीर लोग कैसे चले गए? कैसे कोई साधारण व्यक्ति कमल के फूल पर प्रकट हो सकता है? वेदों से कबीर साहिब की परवरिश की लीलाएं कैसे मेल खा रही हैं? इसलिए संत रामपाल जी महाराज कहते हैं कि शिक्षा को केवल अपने जीवन के निर्वाह हेतु नहीं बल्कि अपने मोक्ष कल्याण हेतु प्रयोग कीजिए। अध्यात्म को समझिए। अपने ग्रंथों को फिर से पढ़िए। ताकि आपके जीवन में आने वाले संकट आध्यात्मिक पढ़ाई बढ़ने से खत्म हो सके। आपको इसलिए परमात्मा ने दिलाई है कि आप परमात्मा पहचान लो। ना इस रोजी-रोटी के लिए इस शिक्षा की कतई जरूरत नहीं थी पहले हमारे पूर्वज थे। अपना simple way से कच्ची झोपड़ी डालकर मकानों में गुजारा करते थे। बीस-बीस दस-दस पीढ़ी ऐसे पार हो गई। निकल गए यहाँ से टाइम पास करके। और जब से ये शिक्षा मिली है हमें इस भौतिक सुख तो पर दुख टेंशन बिना गिनती की होगी। अब इसको देना अनिवार्य था नहीं पहले परमात्मा ने ये विष आपके ऊपर नहीं आने दिया। अब इसलिए ये शिक्षा आपको इसको बहुत अच्छा मानते हैं लेकिन अच्छा ये इस दृष्टिकोण से तो अच्छा है। कि हम भगवान पहचान लेंगे अब बस और बाकी डॉक्टर बन गए, इंजीनियर बन गए। हैं और कोई आईएस, आईपीएस बन गए। ये तो पेट का रोला है सारा। इस इसकी जरूरत हमने नहीं थी अपना दो रोटी चाहिए थी आराम से और simple भी ऐसे रहता है वो जीव सुखी है इन कोई भी सुखी नहीं प्राणी चाहे कितना या बड़ा अफसर हो अधिकारी हो चाहे मंत्री हो चाहे मुख्यमंत्री हो वो सुख नाम की चीज नहीं उनके पास क्योंकि हमें पता नहीं परमात्मा ने हमें बताया कि इक्कीस ब्रह्मांड में सुख नाम की चीज नहीं है कि जब भूला करी हो तुम्हारे लेकिन ये शिक्षा जो मिली है इसका उद्देश्य ये है कि हम भगवान पहचान लेंगे अपना पीछा छुटवा लेंगे और वहाँ चले आएंगे जहाँ जरा और मरण नहीं होता वहां वृद्ध अवस्था नहीं होती वहां पर मृत्यु नहीं होती। तो फिर हम वहीं ना रहेंगे यहाँ क्या करेंगे यहाँ जो चाहे कितना सुखी है आपके पास बच्चे भी है संतान अच्छी है आपकी और खूब यहाँ सांसारिक भौतिक सुख भी है कल मृत्यु हो जाए भक्ति बिना अगले दिन गधा बन गया बता चाट ले उस ठाट ने जो छोड़ के चला गया के काम आया आपके तो परमात्मा कहते है हम जब मृत्यु तो होगी। ये परिवार भी आप साथ नहीं जावेगा। ठीक है इसमें रहते हुए बच्चों को भी इस मार्ग पर लगाओ। इसी सीढ़ी पे चढ़ा दे उनको भी। और आशा करे कि दोबारा यहाँ नहीं आएंगे। हे भगवान सपने में भी नहीं सोचा फिर जन्म हो मेरा आया। फिर जन्म हो गया या दुर्गति फिर शुरू हुआ जो सफर कर रहे हो आप। ना जाने कब ये पूरा हो जाए। कब छोड़ के जाना पड़ जाए। ऐसी कहर में हम रह रहे हैं हरकत, कतई निश्चिंत, ठाठ बना रहे हैं कि नाचे कूदे अब। भंगड़े पावे। ऐसे गंदे लोक में और नाचन को दिन का गाने सुने फिर देखे ये कैसी रुचि बन जाती है आप लोगों की? फिर आपके छींट नहीं लागरी इस ज्ञान की। आपने समझा नहीं इस परमात्मा क्या कहने आए थे हमारे लिए तुम कहाँ पड़े हो? और निकलो यहाँ से फिर हमारा छींटने लगी अभी। क्योंकि हमारे गहराई से जख्म बनना चाहिए अंदर शरीर में आत्मा में कि हम कहाँ रह रहे हैं? नानक साहब जी से पूछा था कि आप यहाँ हमेशा मायूस से रहते हो। तब उन्होंने कहा था भाई मायूस क्यों ना रहना जाने यहाँ के बिजली पड़ जाए एक मिनट में। ना जाने काल की और जिन आते-सरते मौत खुड़कती उनानो केड़ा एक विवाह हुआ, विवाह की तैयारी थी लड़के वाले नाचो कूद डीजे ला रखे और बहुत मस्ता अगले दिन बरात जावे थी बीस किलोमीटर गए थे अपने शहर से वहां दुर्घटना हो गई दूल्हा भी मर गया और पांच और मर गए पहले दिन ते डीजे बाजे नाचे थे। अगले दिन समाचार पेपरों में उनकी रोते हुए बिलखते उनकी चित्र देख के आत्मा रो रही थी हे भगवान, हे परमात्मा बढ़िया आँख खुली आपने हमारी। कहते हैं ना जाने काल की पासा वे और जिन आते-सिते मौत खुड़क दी उनानो एक सेकंड का भरोसा निके भी गिर जा और यहाँ नाचे कूदे fund करे तो बिना ज्ञान के नशे में आदमी ऐसी गलती कर सकता है। कबीर ये माया अटपटी और किस-किस ने समझाऊं या कुएं भांग पड़ी तो अब ये भांग को उतारने का एंटीबायोटिक कैप्सूल ये प्रवचन और ये ज्ञान, ये मंत्र रूपी औषधि आपको कानों के माध्यम से प्रवेश की जा रही है। तो इससे जब पता चलेगा अध्यात्म ज्ञान से परिचित होंगे तब हम सफल होंगे। आइए आध्यात्मिक ज्ञान चर्चा में आगे बढ़ते हैं। और देखते हैं कि आगे क्या होता है? रामपाल जी महाराज के श्रद्धालुओं की सोई आखिरकार ग्रंथों पर आकर ही क्यों अटकती है? देखो सर, अपने मन-मन की तो सब बता रहे हैं। अब हम अगर हमारे गुरूजी संत रामपाल जी महाराज जी ये सब चीजें बुक में खोल के नहीं दिखाते। हमारी होली बुक्स में बुक भी में ये नहीं कह रहे कि कोई भी बुक उठा के बता दी अगर only books में नहीं दिखाते तो कोई भी नहीं मानने को तैयार होता। क्योंकि शुरुआत जब हुई थी तो लोगों का मानना था कि जो पृथ्वी है वो सूरज के चारों तरफ नहीं घूमते बल्कि सूरज घूमता है लेकिन जब ये परिवर्तन हुए तो हमें जानने को मिला कि सच्चाई क्या है? तो इसी प्रकार में जो संत रामपाल जी महाराज जी हैं वो अपने सतग्रंथों से बता रहे हैं इसीलिए आज मानव समाज को ये मानना पड़ेगा अब मानो या ना मानो लेकिन जो सच्चाई है वो तो सच्चाई रहेगी। अब हमारे सदग्रंथ कह रहे हैं तो इसमें गलत क्या है? दर्शकों जिस प्रकार हमारा देश संविधान से चलता है उसी प्रकार ये सभी लोग ब्रह्मांड भी भगवान के संविधान से चलते हैं। आप जिस देश में रह रहे हो उस देश में आपको क्या करना है और क्या नहीं करना है किस जुर्म की क्या सजा होगी ये सब देश का संविधान तय करता है इसी प्रकार आपको क्या भक्ति साधनाएँ करनी है क्या साधनाएँ नहीं करनी है ये सब भगवान का संविधान तय करेगा और ये संविधान लिखा है पवित्र चारों वेदों में चारों वेदों का सार कहे जाने वाली Gita जी में और पवित्र सूक्ष्म में इनमें लिखे श्लोक, मंत्र, वाणियां ही हमें बता सकती हैं कि हमें क्या साधना करनी चाहिए, क्या नहीं करनी चाहिए इसीलिए संत रामपाल जी महाराज के अनुयायियों की सुई शास्त्रों पर आकर रुक जाती है। चलिए इस आध्यात्मिक ज्ञान चर्चा में देखते हैं कि और क्या खास बातें निकलकर सामने आती हैं। तो मैं सवाल जेल से related आपके बीच रखता हूँ तो सवाल मेरा ये है कि संत रामपाल जी महाराज पिछले दस वर्षों से जेल में हैं। संत रामपाल जी महाराज ही जेल में हैं। तो इस पूरे तामझाम का इतने ज्यादा आश्रमों का क्या मतलब रह जाता है? जी गुरु नानक देव जी भी जेल दे विच रहे। संत रामपाल जी महाराज दा दास जी है परमात्मा। जैसा कि अभी जिक्र हुआ है कि श्री कृष्ण जी भी जेल में थे। लेकिन जब श्री कृष्ण जी का जन्म हुआ था तो जेल के गेट अपने आप खुल गए थे। संत रामपाल जी महाराज के लिए क्यों नहीं खुल रहे ये गेट अपने आप? थोड़ा सा जवाब उधर से आया उसी पे क्रॉस क्वेश्चन आ गया तो मैं जवाब बाकी पूरा जवाब भी लूंगा पहले उसी सवाल का जवाब ले लेता हूँ जो अभी उठा है। जी इनका कहना कि और जो जैसे श्री कृष्ण थे उनके वो द्वार खुल गए थे तो मैं आपसे पूछना चाहूंगी क्या उनके जीवन में आगे कोई कठिनाईयां नहीं हुई? उन्होंने कितने युद्ध लड़ने पड़े? उनके स्वयं के परिवार के जो थे वो उनके विरोधी थे उन्होंने कितने कष्ट से श्री कृष्ण जी को ही क्यों लेते हैं? हम श्री राम को देख लीजिए चौदह वर्ष तक वनवास हुआ, क्या वो कष्ट में नहीं था? वो क्या जेल नहीं थी? उस समय की तो वो जेल ही थी. और देख लीजिए चाहे ईसा मसीह जी हो, उनका जीवन कितना कष्ट में रहा था लोगों को? लोगों ने किस प्रकार से उन्हें प्रताड़ित करते हुए कितने दुःख में जीवन उनका जिसने आज तक समाज में पूरा इतिहास उठा के देख लो आप जिस-जिस ने गलत का विरोध किया है ना उसके साथ ऐसा ही किया है समाज ने दर्शकों ये बेहद महत्वपूर्ण सवाल है अक्सर संत रामपाल जी महाराज के भक्तों को इस सवाल का सामना करना पड़ता है कभी-कभी उनके भक्त इस सवाल को लेकर असहज भी नजर आते हैं क्योंकि हर कोई अपने गुरु के दीदार का प्यासा होता है संत रामपाल जी महाराज के शिष्य इस सवाल को लेकर क्या जवाब देते हैं आइए जानते है हाँ जी तो श्री कृष्ण जी के जीवन परिचय को दिखाते हुए आपने सुना ही होगा कंस केसी चाण और भी तमाम से राक्षस तो वापिस से फिर उसी सवाल पर आ जाता हूँ मैं कि संत रामपाल जी महाराज अभी जेल में है. बहुत से लोगों के मन में ये सवाल है, ये धारणा है. आम जनता के मन में ये धारणा है कि जी मैं संत रामपाल जी महाराज से नाम ले लूँगा. वो जेल से बाहर आए उसी दिन ले लूँगा. हैं जी. ये धरना इन लोगों के मन में कावियों के मन में अभी मिल जाएगी. इसका जवाब बताओ जी. नमस्कार सर. नमस्कार. नरेश चरखी दादरी से। जी सर बताइए। इन लोगों का सवाल है बार-बार जेल में, जेल में जेल में जेल से, जेल में तो निर्दोष भी चला जा सकता है। हमारी महात्मा गांधी जी थे, जेल में गए थे। या तो उन्होंने क्या कोई एटीएम फाड़ के गए थे किसी का? या बैंक लूट के गए थे? वो भी जेल में गए थे? सुभाष चंद्र और राजगुरु, सुखदेव ये तो फांसी टूट गए थे। लेकिन ये कारण क्या था इनका? ये किसी की चोरी करके नहीं गए। मर्डर करके नहीं गए। ये आजादी चाहते थे। उसी प्रकार हमारे जगतगुरु तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज सत भक्ति देकर आत्माओं को यहाँ से काल की जेल से आजाद कराने के लिए सद्भक्ति दे रहे हैं। तो दर्शकों देखा आपने संत रामपाल जी महाराज के शिष्यों का कहना है कि संत रामपाल जी महाराज जेल में नहीं बल्कि उनके साथ ही हैं। हर पल उनकी मौजूदगी का उन्हें एहसास होता है। जैसे किसी मोबाइल टावर की range, मोबाइल को संचालित करती है। उसी तरह संत रामपाल जी महाराज की शक्ति को जेल की दीवारों से रोक पाना असंभव है। और शायद यही कारण है कि लाखों लोग लगातार संत रामपाल जी महाराज से जुड़ते जा रहे हैं। उनकी शक्ति लगातार उनके अनुयायियों को लाभ पहुंचा रही है। दर्शकों जब संत रामपाल जी महाराज के भक्तों से ये पूछा गया कि संत रामपाल जी जेल में बैठकर आपको लाभ कैसे दे रहे हैं? तो सुनिए उन्होंने क्या जवाब दिया? एक संत इतनी दूर बैठा है और आप लोग उस संत से उस टीवी के माध्यम से नाम दीक्षा लेते हो तो आपको लाख कैसे हो जाती है? आज के युग में इस चीज पे कैसे विश्वास किया जा सकता है? जी हमें इस वजह से लाभ होते हैं क्योंकि हम सत भक्ति, सत सच्चे मार्ग से सद्भक्ति करते हैं. अगर वो संत से दूर भी बैठा है हम ये भी तो कह सकते हैं कि शिव भगवान, विष्णु भगवान हमसे इतने दूर बैठे हैं तो हम उनकी भक्ति क्यों करें? वो भी तो हमसे इतने दूर बैठे हैं। ऐसे दूर बैठने का कुछ नहीं है वो परमात्मा घट-घट में विराजमान है। वो हमारे हर जगह विराजमान हैं। उसके दूर या पास होने से कोई मतलब नहीं होता है। but ये हमें इस जानना है कि वो कौन सा सही रास्ता है, सही मार्ग है जिसे हम सद्भक्ति करें और जिससे हमें लाभ प्राप्त हो। जैसे आधुनिक युग में मैं आपको एक बात बताती हूँ हमारे पास फोन है उसका टॉवर हमसे इतनी दूर है तो हमारे तक वो रेंज पहुंचा रहा है. वैसे ही एक पूर्ण संत होता है जो दूर बैठे हुए भी अपने भक्तों को लाभ दे सकता है. दर्शकों आइए अब आपको एक ऐसे महात्मा का अनुभव सुनाते हैं जिनकी आध्यात्मिक प्यास और शारीरिक कष्ट का निवारण. एक ऐसे संत ने किया. जिनको आम लोग जेल में समझते हैं. सर संत रामपाल जी महाराज जी से नाम दीक्षा लेने से पहले. आप क्या भक्ति साधना करते थे? हम अध्यात्म जुड़े हुए और परमात्मा के पाने की चेष्टा से, लगन से मैं कई मतपथ में गया जहाँ हमको इस जिज्ञासा से गए कि हमको प्रभु परमात्मा की जानकारी होगी और इस कारण से मैंने रामानंद स्वामी के पथ में वो देहात में चलने वाले वचन वंश कबीर पंथी ने और आर्य समाज में या वो बाल जोगेश्वर जी में सतपाल जी में, ठाकुर अनुकूल चंद्र जी के सत्संग में और प्रजापिता ब्रह्माकुमारी के सत्संग में कई स्थानों हम लगभग तेरह मिशन में घूमें परमात्मा के दर्शन के लिए. लेकिन कहीं से हमें कुछ प्राप्ति नहीं हुआ. कोई तो आँख बंधन करने को कह दिया. कोई कहा ध्यान लगाओ, कोई कहा कर्म नवली करो. कोई कुंडलियाँ जागृत करने को कह दिया. किसी ने कहा कि वो आ ना के ऊपर दोनों दृष्टि जमा करके देखो. भगवान का दर्शन होगा. बहुत हम परेशान में पड़ गए. देखा कि हर जगह वही बात है. ठगी की बात हो रही है. तब हमें कान में एक शब्द मिला निरंकारी मिशन का जो निरंकारी मिशन उन्नीस सौ बानवे में बहुत कम जत्थे में था और उस समय जब हमारे ध्यान में ये निरंकारी मिशन तो उसमें हमने जाकर के ज्वाइन किया और चौबीस साल तक इस भक्ति में लगा रहा. इस दौरान में मैंने अपने संपूर्ण वैशाली जिले में लगभग चौबीस ज्ञान केंद्र खोला. और ज्ञान प्रचारक हमारे साथ होते थे. और मैं प्रचार का काम करता था. पूरे बिहार में कटिहार वो ठाकुरगंज पूर्णिया लगभग दस से बारह हजार लोगों को मैंने प्रभावित करके उनको इस ज्ञान से जोड़ा. सर आपने बताया कि आप चौबीस साल तक निरंकारी मिशन से जुड़े रहे. तो सर इस चौबीस साल में आपको क्या अज्ञान की अनुभूति रही है सर? इसमें हमको मिला-जुला कर कोई अनुभूति नहीं हुई. और ना मैंने कुछ देखा और ना इसके हमका कुछ लाभ भी प्राप्त हुए. ऐसे ही हम भजते चले जा रहे थे. और उसमें एक साधारण मंत्र था मैं तेरी शरणा मैनू बख्श लूँ. यही जपते-जपते मेरा बाईस साल, चौबीस साल का समय निकल गया. लेकिन इससे कुछ लाभ नहीं हो सका. इस क्रम में मैं दूर-दूर जगहों पर जाकर के और सत्संग प्रवचन किया करता था। दुर्गद्दी पर हम हमको बैठाया जाता था। वहाँ से हम अध्यात्म प्रवचन करते थे। गीता से रामायण से, कुरान से, कुरान से, वेदों से, शास्त्रों से कह करके लोगों को प्रभावित करते थे, कभी-कभी इतने जिज्ञासुओं का भीड़ हो जाता था। कि नमस्कार करने में लाइन बन जाती थी और बड़ी भीड़ हो जाती थी तब हमारे दोनों पैर पर दोनों पैर को करके दायां बायां एक पर बहने और एक पर भाइयों का लाइन लगता था और सभी लोग सर पटक करके हमारे चरणों पर नमस्कार करते थे और उसी में वो लोग ये जिज्ञासा करते थे कि बाबूजी जरा माथे पर हाथ रख दो और मैं माथे पर हाथ रख देता था जरा धोना में पिटी में दर्द हो रहा है इस पर जरा हाथ पर दो ये बच्चे को जो आशीर्वाद दे दो ये बड़ा बीमार रहता है ये सब काम हमें अ करना पड़ता था और उसको करते थे. सर आपने बताया कि आप निरंकारी मिशन की गद्दी पे बैठते थे. निरंकारी पंथ से जुड़े थे आप प्रवचन करते थे स्वयं. और फिर आप संत रामपाल जी महाराज जी की शरण में आ गए. सर आपको क्या ऐसा लगा? निरंकारी मिशन में तो बहुत सारे लोग ने हमारे दुःख को मेरे कहने पर जाना लेकिन उसमें मेरा कोई इलाज नहीं हो सका. और वहाँ तो बड़ी-बड़ी औषधालय भी खुली हुई है. क्या-क्या है. लेकिन हमको कोई सहारा कहीं से कुछ नहीं मिला. और डॉक्टरों से परेशान होकर के हम बिल्कुल निराश हो गए थे. और धाराशाही होकर के बेड पर पड़े हुए थे. साढ़े पाँच महीना हम लगातार बेड पर ही पड़े रहे हैं. जहाँ पैसे के आभाव में दवा भी नहीं खा पाते थे और हमें खाना भी नहीं, खाने का इच्छा होता था. केवल पानी पी के, दूध पी के, एकाद रोटी किसी तरह से खा करके हम पानी पी लेते थे. इसी बीच में हम सोचे कि अब हम नहीं बचेंगे. एक साथी मेरा पंजाब रहता है. वो जब लौट के घर गया तो हमसे भेंट करने गया. जाने के बाद कहा कि आपने कैसी हालत बना ली, बताइए, भगवान का भक्ति करते हैं. ये हालत आपका बन गया है. ये कैसे हो गया? हमने कहा ऐसे ही हो गया अब हम क्या करें? तो उन्होंने एक किताब हमको दिया पढ़ने के लिए और वो किताब का नाम था ज्ञान गंगा ज्ञान गंगा किताब हम पढ़ने के काबिल भी नहीं थे इतने कमजोर हो गए थे. मैंने कहा कि हम किताब तो नहीं पढ़ सकते. जरा तुम ही पढ़ के सुनाओ तो अच्छा रहेगा. तो वो तीन रोज आकर के हमको किताब का कहीं-कहीं का कोई-कोई चैप्टर पढ़ के सुनाया हमको बहुत अच्छा लगा. अब किसी की किडनी खराब है. और उनका डॉक्टर इंकार कर रहा है. कहता है चार लाख रूपए लगेंगे और वो बताना कि नहीं मेरा किडनी ठीक हो गया सतगुरु रामपाल जी की कृपा से किसी का लीवर खराब है किसी के **** में घाव है ममाज निकल रहा है परेशान है किसी के पेट में दर्द है लगता है कोई भीतर दांत काट रहा है ऐसे ऐसे बहुत सारे रिपोर्ट आए तो मुझे पहले तो धीरे-धीरे इस पर विश्वास होने लगा हमने सोचा कि अब मैं क्या करूं हम भी अब वहां कुछ फोन करके पता करना चाहते हैं तो उन्होंने कहा कि पता है इसका कहाँ फोन नंबर है हमने कहा कि रुक जाओ रुक जाओ आज हम सतगुरु रामपाल जी महाराज से हम बात करेंगे। तब हम कल आपको कुछ बताएंगे। तो उन्होंने कहा कि कैसे बताइएगा? वो तो जेल में रहते हैं। हम उनकी हम भी तो गुरु की सेवा कर रहे हैं चौबीस साल से और ये सतगुरु हैं। तो जरूर हम पर कृपा करेंगे मुझे विश्वास है। ऐसा सोचकर मैं रात में नौ बजे खाना वाना खा करके जब सोने गए तो हम तो कुछ जानते नहीं थे। हम तो केवल इनका नाम सुनते थे और किताब में फोटो देखा था। इन्हीं के फोटो को हमने सतगुरु रामपाल जी महाराज की जय, रामपाल जी महाराज की जय. पाँच बार यही जयकारा लगाकर के हम हाथ जोड़कर के प्रार्थना किया कि हे सतगुरु रामपाल जी महाराज आपकी बहुत सारी प्रशंसा इस किताब के अंदर मैंने सुनी है. बहुत सारे लोगों का बीमारी भी खत्म हो गया है. मेरी भी बीमारी खत्म करो. और मुझे भी ठीक कर दो. अगर ऐसा कर दोगे तो शेष जीवन जो मेरा बचेगा. ये हम आपके चरणों में बिताएंगे. आपके चरणों में भक्तों की सेवा करके अपना जीवन बिताएंगी और ऐसा करिए कि मैं बहुत दुखी हो गया हूँ अगर ठीक करना है तो आज रात में आकर के आज रात भर में ही हमको ठीक कर दीजिए। दो, चार, दस रोज लगाइएगा तब इस चीज को हम नहीं मानेंगे। ऐसा प्रण करके हम सो गए कैदी नींद भी नहीं आ रही थी, उस दिन नींद भी बहुत अच्छा पड़ा। साढ़े तीन बजे भोर की बात है। कि हम जहाँ सोए हुए थे उसी में निरंकारी आश्रम चलता था हर रविवार को सत्संग चलता था। तो रात में साढ़े तीन ये सतगुरु रामपाल जी महाराज वहां पहुंच गए। सादा पैजामा हाफ कुर्ता, गमछा रखे हुए और कुर्ते का रंग थोड़ा हल्का गेरुवा रंग का पहने हुए हाफ कमीज और कुर्सी खींच करके उसी जगह बैठ गए। कुर्सी के खींचने का आवाज हमको कान में मिला। और तब आवाज सुनकर के हम हमारी आँख खुल गई। हम देखते हैं कि अरे कुर्सी कौन खींचा? देखते हैं कि सामने में सतगुरु रामपाल जी महाराज बैठे हैं जैसे वो बैठते हैं उसी एक पैर पर दूसरा पैर रख कर के दोनों हाथ एक साथ करके लगता है जैसे कोई मंत्र कर रहे हो या कुछ कर रहे हो बैठे हुए हैं। मैंने सोचा कि मैं स्वप्न देख रहा हूँ कि वास्तव में जागृत अवस्था में हूँ ये समझ में नहीं आया और मैं उनके चरणों में जाकर के नमस्कार किया। फिर उन्होंने पूछा बड़े प्यार से कि बेटे क्यों बुलाए हो हमको? हमने कहा कि दास तो सब नौ बजे रात में ही सब बात आपके चरणों में रख के सो गया है। आप तो अंतर्यामी भी है। आप यहाँ आ भी अब हमसे क्या पूछ रहे हैं कि क्या बोला? तो नहीं तुम ये बोला कि हमको ठीक करना है तो रात भर में ठीक कर दीजिए और नहीं तो दो-चार रोज में करेंगे तो हम नहीं मानेंगे. हम किसी सरकार ऐसा तो उदास बोला है. अब मरता क्या ना करता? बीमारी को तो लाजिम है अच्छा होने का. इसी तो तत्परता में हम आपके सामने ऐसा बोला है. हो सकता है गलती हो गई है. तो आप पिता तुल्य हैं. पिता है ही. आप हमारे माफी करके और हमको ठीक कर दीजिए. हम तो फिर भी हंसने लगे कहे कि बेटे तुम्हारे सर पर बहुत सारे भार हैं। बहुत सारे बोझ लाद लिया तुम। ये बताओ तुम्हारे चरणों में कितने आदमी का सर गिरा है? हमने कहा इसकी कोई गिनती नहीं अनगिनत है। वो पचासों हजार, लाखों लोग इस पर माथा पटके होंगे इस चरण पर। इसका कोई ठिकाना नहीं है। अब बताओ इतने दिन का जटिल बीमारी। तुम कहता रात भर में ठीक कर दो। ठीक तो हो जाओगे। तू नाम दीक्षा ले भक्ति कर मर्यादा में रह तू ठीक हो जाएगा और मेरे पास आ गया तो मैं कुछ होने वाला नहीं घबराओ नहीं और ये सब पूछ कर के और हमको कहे कि जब ठीक है जब ऐसी ही बात है तो फिर कल से तू ठीक हो जाओ ऐसा कह के हमारे सतगुरु रामपाल जी महाराज जो आकर के हमको बताए और वहाँ से चले गए जाने का भी क्रम देखा तो अद्भुत लगा हमको जैसे हनुमान जी एक पैर नीचे सीधा करके और एक पैर मोड़ करके और ऊपर दक्षिण की इस तरह से उड़ गए बहुत देर तक हम खड़ा होकर देखते रह गए जब तक आँख से ओझल नहीं हुआ और दक्षिण दिशा की तरफ वो चले गए। मैं फिर चौकी पर बैठ गया जो छह महीना से उठ नहीं पा रहा था, खा नहीं पा रहा था। चहल टहल नहीं पा रहा था। मैंने अपने बाजू पर बाजू रख के अंदाज किया। कि मेरी क्या हालत है? तो मैं अपने में बहुत दुरुस्ती पाया, ताकत पाया और हमको लगा कि कोई नई ताजगी आ गई और मैं बिछावन पर से उठ कर के सामने मेरा रोड है। उसी वो पर चला गया और चार किलोमीटर पैदल चले गया घूम करके टहल के चार किलोमीटर चले आए और उस दिन से हम बिल्कुल ठीक हो गए अब हमको लगता है कि वो दर्द भी हमको अब स्वप्न के रूप में भी कोई महसूस नहीं होता है कि दर्द हो रहा है या नहीं हो रहा है वो लगता है अब है ही नहीं. वो पत्थर-वथर सब खत्म है. सतगुरु रामपाल जी महाराज की कृपा से. सर आपको पूरा विश्वास है कि आपके गुरु संत रामपाल जी महाराज जेल से बाहर आएंगे. क्या निर्दोष हैं? पूरा विश्वास है. जब हमारे इतने ड़े बीमारी से वो हमको निकाल सकते हैं. हमारे पित्त के थैली में से पत्थर निकाल सकते हैं। हाथ पैर करके बिना छुरी का. डॉक्टर कह रहे थे कि चक्कू लगेगा तो मर जाओगे. तुम तो चीनी का बीमारी है. तुम जब हमको निकाल सकते हैं हमारे हमको उठाकर खड़ा करा सकते हैं. हम कैसे समझे कि जेल में हैं. अगर जेल में होते तो मेरे पास मेरे बिस्तर के नजदीक जाकर कैसे बैठ जाते? मेरी हाल कैसे पूछ लेते? और कैसे कहते कि जाओ तू कल से ठीक हो जा? अगर वो जेल में होते तो निकल कर के चले आते हैं। अब निर्णय आपको करना है जिस संत की शक्ति हमेशा अपने भक्तों के साथ है तो वे जेल में कैसे हो सकते हैं?
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क्या कर्मों का फल भुगतना ही पड़ता है? | कैसे पाए छुटकारा? | Factful Debates | By Spiritual Leader Saint Rampal Ji | Facebook